
जबलपुर के वैज्ञानिकों का कमाल! कम पानी में धान की खेती, लागत घटाने और उत्पादन बढ़ाने के लिए भारत-फिलीपींस के वैज्ञानिक कर रहे शोध
मध्य प्रदेश के जबलपुर स्थित जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय में भारतीय वैज्ञानिक, फिलीपींस के अंतरराष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान (IRRI) के साथ मिलकर धान की नई किस्मों पर शोध कर रहे हैं। लक्ष्य ऐसी किस्में विकसित करना है, जिनकी खेती में कम पानी और कम मजदूरों की जरूरत पड़े, लेकिन उत्पादन पारंपरिक खेती के बराबर रहे।
धान की खेती में आएगा बदलाव?
शोध में धान की सीधी बिजाई तकनीक पर विशेष जोर दिया जा रहा है। इस विधि में नर्सरी से पौधों को निकालकर कीचड़युक्त खेत में रोपने के बजाय सीड ड्रिल मशीन से सीधे खेत में बीज बोए जाते हैं। इससे पानी, मजदूरी और खेती की लागत कम करने की संभावना है।
नई किस्मों में होंगी ये खासियतें
कम पानी में बेहतर उत्पादन देने की क्षमता।
सूखे और विभिन्न रोगों का सामना करने की क्षमता बढ़ाने पर जोर।
खरपतवार नियंत्रण और मजदूरी का खर्च कम करने की संभावना।
चावल में जिंक, मैग्नीशियम और आयरन जैसे पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ाने पर शोध।
1,000 से अधिक किस्मों पर हो रहा अध्ययन
विश्वविद्यालय के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. संजय सिंह के अनुसार, शोध संस्थान में धान की 1,000 से अधिक किस्में एकत्रित हैं। इनमें देसी, निजी कंपनियों की और विश्वविद्यालय की पुरानी किस्में शामिल हैं। फिलीपींस से लाई गई किस्मों का भी परीक्षण किया जा रहा है। शोध का तीसरा वर्ष चल रहा है और वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि अगले एक से दो वर्षों में कुछ नई किस्में किसानों के लिए जारी की जा सकती हैं।
JR 49, JR 122 और JR 83 का 12 जिलों में परीक्षण
जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय की JR 49, JR 122 और JR 83 किस्मों के बीज किसानों को उपलब्ध कराए गए हैं। मध्य प्रदेश के 12 जिलों में इनका परीक्षण किया जा रहा है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस साल करीब 1,200 किसानों तक इन किस्मों के बीज पहुंचाए गए हैं। खासकर JR 49 और JR 83 को लेकर किसानों से सकारात्मक प्रतिक्रियाएं मिली हैं।
आने वाले साल में इन किस्मों के बीज और किसानों तक पहुंचाने की योजना है। यदि शोध के नतीजे और खेतों में परीक्षण सफल रहते हैं, तो कम पानी और कम लागत वाली धान की खेती मध्य प्रदेश के किसानों के लिए एक उपयोगी विकल्प बन सकती है।
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