
⬇️पिथौरागढ़ :- नगर के श्रीरामलीला मैदान में आज से सातूँ आठूँ की धूम , 26 अगस्त तक चलेगा आठूँ मेला !⬇️
🔯क्या है मान्यता ?🔯
सातूं-आठूं, जिसे गमरा-मैसर या गमरा उत्सव भी कहा जाता है, नेपाल और कुमाऊं की साझी लोकसंस्कृति का एक बेहद पुराना लोकपर्व है। माना जाता है कि इसकी परंपरा का मूल उद्गम पश्चिमी नेपाल के दार्चुला, बैतड़ी, डडेलधुरा और डोटी क्षेत्र से हुआ। काली नदी के आर-पार बसे गांवों के बीच सदियों से चले आ रहे रोजी-बेटी के रिश्तों के साथ यह परंपरा कुमाऊं तक पहुंची और आज पिथौरागढ़, गंगोलीहाट, बेरीनाग, बागेश्वर और चम्पावत के कई इलाकों में आस्था के साथ मनाई जाती है।
इस पर्व की सबसे खास पहचान है गौरा-महेश्वर की लोकगाथा। इन गाथाओं में भगवान शिव और पार्वती के विवाह से लेकर गणेश के जन्म तक की कथा मिलती है, लेकिन इसकी खूबसूरती यह है कि यहां शिव-पार्वती केवल देवता नहीं, बल्कि पहाड़ के आम जनजीवन का हिस्सा बनकर सामने आते हैं।
गाथा में महेश्वर को नदी किनारे बकरियां चराते हुए एक साधारण, मेहनतकश पहाड़ी किसान के रूप में देखा जाता है, जबकि गौरा एक ऐसी स्त्री के रूप में सामने आती हैं जो अपने ससुराल से मायके की ओर जाते हुए रास्ता भटकती हैं और रास्ते में पेड़-पौधों से अपना मार्ग पूछती हैं।
गौरा जब बांज, देवदार, हिंसालू, काफल, नींबू और नारंगी जैसे पेड़ों से रास्ता पूछती हैं, तो लोकगाथा में प्रकृति भी उसके साथ संवाद करती दिखाई देती है। वह पेड़ों को आशीर्वाद देती है - कहीं फूलों और फलों से लदे रहने का, तो कहीं मनुष्यों और देवताओं के काम आने का।
यही इस लोकपर्व की सबसे बड़ी खूबसूरती है - यह केवल धार्मिक कथा नहीं, बल्कि पहाड़ के मनुष्य, प्रकृति, परिवार और समाज के रिश्तों की कहानी भी है।
और शायद इसीलिए पहाड़ के लोक ने गौरा को अपनी बेटी/दीदी और महेश्वर को जवाईं/भीना मानकर अपने ही परिवार का हिस्सा बना लिया।
सातूं-आठूं इसलिए सिर्फ एक पर्व नहीं, यह काली नदी के दोनों किनारों को जोड़ती हमारी साझा स्मृति, संस्कृति और पहचान है।
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