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piyush upreti

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⬇️आठूँ मेला 2026 के पाँचवें दिन सतगढ़ की हिलजात्रा ने मोहा मन, महाकाली और हिरन-चीतल के दर्शन ने बढ़ाई रौनक⬇️

पिथौरागढ़ :- श्री रामलीला प्रबन्धकारिणी समिति द्वारा आयोजित आठूँ मेला 2026 के पाँचवें दिन भी मेले में श्रद्धा, लोकसंस्कृति और उत्साह का अद्भुत संगम देखने को मिला। बड़ी संख्या में लोग मेले में पहुंचे और विभिन्न सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का आनंद लिया। मेले की रौनक के बीच सतगढ़ हिलजात्रा दल की प्रस्तुति दिन का प्रमुख आकर्षण रही।

सतगढ़ से पहुंचे हिलजात्रा दल ने अपनी पारंपरिक प्रस्तुति के माध्यम से कुमाऊँ की लोकसंस्कृति और ग्रामीण जीवन की झलक प्रस्तुत की। हिलजात्रा के पारंपरिक पात्रों और आकर्षक प्रदर्शन ने दर्शकों को खूब प्रभावित किया। जैसे-जैसे प्रस्तुति आगे बढ़ी, दर्शकों की भीड़ बढ़ती गई और पूरा मेला क्षेत्र तालियों व उत्साह से गूंज उठा।

हिलजात्रा में माँ महाकाली के स्वरूप और भगवान हिरन-चीतल की उपस्थिति ने श्रद्धा का भाव और गहरा कर दिया। लोकमान्यता और परंपरा के अनुरूप इन स्वरूपों को आशीर्वाद और मंगलकामना का प्रतीक माना गया। लोगों ने श्रद्धा के साथ दर्शन किए और इस पारंपरिक लोकअनुष्ठान का हिस्सा बने।

रिमझिम बरसात के चलते मेले में उमड़ी भीड़ और दर्शकों का उत्साह इस बात का प्रमाण रहा कि लोकसंस्कृति से जुड़ी प्रस्तुतियां आज भी समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम कर रही हैं।
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⬇️आठूँ मेला 2026 के चौथे दिन उमड़ी हजारों की भीड़, मानस स्कूल की हिलजात्रा ने जीता दिल⬇️

पिथौरागढ़ में श्री रामलीला प्रबन्धकारिणी समिति द्वारा आयोजित आठूँ मेला 2026 के चौथे दिन रिमझिम बारिश के बीच भी मेले में हजारों की संख्या में लोगों की भीड़ उमड़ी। खराब मौसम के बावजूद लोगों का उत्साह कम नहीं हुआ और देर शाम तक मेला क्षेत्र में चहल-पहल बनी रही।

चौथे दिन मेले का प्रमुख आकर्षण मानस स्कूल द्वारा प्रस्तुत हिलजात्रा रही। विद्यार्थियों ने पारंपरिक हिलजात्रा के विभिन्न पात्रों और लोक परंपराओं को आकर्षक ढंग से प्रस्तुत किया। शानदार प्रस्तुति ने दर्शकों का मन मोह लिया और लोगों ने तालियों के साथ कलाकारों का उत्साह बढ़ाया।

मेले में विभिन्न खेल प्रतियोगिताओं का भी आयोजन किया गया, जिसमें क्षेत्र के विद्यालयों के छात्र-छात्राओं ने बढ़-चढ़कर प्रतिभाग किया। खिलाड़ियों ने अपनी प्रतिभा और खेल भावना का प्रदर्शन करते हुए प्रतियोगिताओं को रोमांचक बना दिया।

आठूँ मेले के चौथे दिन सांस्कृतिक कार्यक्रमों, लोक परंपराओं और खेल गतिविधियों का अनूठा संगम देखने को मिला। बारिश के बावजूद बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी ने मेले की रौनक बढ़ा दी। आयोजन समिति की ओर से मेले को सफल बनाने के लिए लगातार व्यवस्थाएं की जा रही हैं।

आठूँ मेला न केवल मनोरंजन का माध्यम बन रहा है, बल्कि स्थानीय लोकसंस्कृति, परंपराओं और प्रतिभाओं को मंच देने का महत्वपूर्ण अवसर भी साबित हो रहा है। चौथे दिन उमड़ी भीड़ और हिलजात्रा की शानदार प्रस्तुति ने मेले की यादगार शाम को और खास बना दिया।
‘गिर्दा’ की कहानी: नालायक भव्वा से जनकवि बनने तक

10 सितंबर 1945 को अल्मोड़ा के ज्योली गांव में जन्मे गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’ का बचपन का नाम ‘भव्वा’ था। गांव में उन्हें आवारा और नालायक लड़कों में गिना जाता था, लेकिन यही आवारागर्दी उनके लिए समाज और लोकजीवन को समझने की पहली पाठशाला बनी।

रिक्शा चलाने और मजदूरी करने से लेकर भारत सरकार के गीत एवं नाटक प्रभाग तक का सफर तय करने वाले गिर्दा ने अपने गीतों और कविताओं को आम लोगों की आवाज बनाया। चिपको, नशा नहीं रोजगार दो और उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन जैसे जनसंघर्षों में उनके गीत आन्दोलनकारियों का हौसला बने।

गिर्दा सिर्फ कवि नहीं थे, वे लोकसंस्कृति के साधक, सामाजिक कार्यकर्ता और जनआन्दोलनों की आवाज थे। 22 अगस्त 2010 को वे दुनिया से विदा हुए, लेकिन उनके गीत आज भी पहाड़ के जंगलों, सड़कों और जनसंघर्षों में गूंजते हैं।

ज्योली का ‘नालायक भव्वा’ आखिरकार पूरे पहाड़ की आवाज बन गया।

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⬇️घुनसेरा की रेखा भट्ट बनीं महिला आत्मनिर्भरता की मिसाल, तीलू रौतेली पुरस्कार से सम्मानित⬇️

पिथौरागढ़ के बिण विकासखंड के घुनसेरा गांव निवासी रेखा भट्ट राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़कर महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम कर रही हैं। हरु सैम देवता स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष रेखा को समूह के लिए ₹75 हजार सीआईएफ, ₹2 लाख सीसीएल और ₹25 हजार आरएफ की सहायता मिली।

रेखा भट्ट को महिला सशक्तिकरण और आजीविका के क्षेत्र में योगदान के लिए वर्ष 2025 में तीलू रौतेली पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वर्तमान में वह एनआरएलएम के ‘सरस’ सेंटर का संचालन कर रही हैं, जहां स्वयं सहायता समूहों के पहाड़ी उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराया जा रहा है।
पिथौरागढ़ जिले में स्थित सतगढ़ क्षेत्र का प्रसिद्ध सातूं-आठूं ( गौरा-महेश्वर ) पर्व के दौरान प्रस्तुत किया जाने वाला माँ महाकाली का मुखौटा नृत्य और अभिनय है, जिसमें स्थानीय युवा पारंपरिक हस्तनिर्मित मुखौटों के जरिए लोकजीवन और पौराणिक प्रसंगों को जीवंत करते हैं।
⬇️पिथौरागढ़ :- आठूं मेले के द्वितीय दिवस निकली भगवान महेश्वर की भव्य झांकी, लोक संस्कृति के रंग में रंगा पिथौरागढ़⬇️

नगर में आयोजित आठूं मेला 2026 के द्वितीय दिवस धार्मिक आस्था और लोक संस्कृति का अनूठा संगम देखने को मिला। इस अवसर पर ग्राम सेरा खड़कोट से भगवान महेश्वर की भव्य झांकी निकाली गई। स्थानीय महिलाओं और विद्यालयी छात्र-छात्राओं ने उत्साहपूर्वक झांकी में भाग लिया। पारंपरिक गीतों, भजनों और जयकारों के बीच निकली झांकी ने नगर के माहौल को भक्तिमय बना दिया।

झांकी ग्राम सेरा खड़कोट से प्रारंभ होकर नगर के विभिन्न क्षेत्रों से होते हुए श्रीरामलीला प्रबन्धकारिणी समिति मैदान पहुंची। यहां भगवान महेश्वर की प्रतिमा को विधिवत रूप से स्थापित किया गया। झांकी के मार्ग में श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों ने दर्शन कर भगवान महेश्वर का आशीर्वाद लिया।

इस दौरान महिलाओं की सहभागिता और विद्यार्थियों की मौजूदगी ने आयोजन को विशेष आकर्षण दिया। पारंपरिक परिधानों में शामिल महिलाओं और उत्साह से भरे छात्र-छात्राओं ने कुमाऊं की लोक परंपरा और सांस्कृतिक विरासत की जीवंत तस्वीर प्रस्तुत की।

आठूं मेला पिथौरागढ़ की धार्मिक आस्था, लोक परंपराओं और सामुदायिक सहभागिता से जुड़ा महत्वपूर्ण आयोजन है। मेले के माध्यम से नई पीढ़ी को अपनी पारंपरिक संस्कृति और लोक विरासत से जोड़ने का प्रयास भी देखने को मिल रहा है।
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⬇️कुमौड़ की हिलजात्रा: लखियाभूत से जुड़ी वीर महर भाइयों की कहानी⬇️

कुमौड़ की प्रसिद्ध हिलजात्रा केवल एक लोक उत्सव नहीं, बल्कि इतिहास, लोकविश्वास और नेपाल-कुमाऊँ की साझा सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। इस उत्सव के मुख्य पात्र लखियाभूत या लखियादेव माने जाते हैं।

हिलजात्रा की शुरुआत को लेकर चार वीर महर भाइयों की कथा सबसे अधिक प्रचलित है। मान्यता है कि पिथौरागढ़ में एक समय नरभक्षी शेर का आतंक था। राजा ने उसे मारने वाले को मनचाहा पुरस्कार देने की घोषणा की। चारों महर भाइयों ने शेर का वध कर दिया।

राजा ने प्रसन्न होकर उन्हें पुरस्कार मांगने को कहा। कुंवर सिंह कुरमौर ने चंडाक से दिखाई देने वाली भूमि मांगी, जिससे कुरमौर से कुमौड़ नाम पड़ने की लोकमान्यता है। अन्य भाइयों के नाम से चेंसर, जाखनी और बिण के नाम जुड़े होने की भी मान्यता है।

एक दूसरी लोककथा हिलजात्रा को नेपाल की इंद्रजात्रा से जोड़ती है। कहा जाता है कि नेपाल यात्रा के दौरान महर भाइयों ने राजा की भैंसे की बलि से जुड़ी कठिन समस्या का समाधान किया। प्रसन्न होकर राजा ने उन्हें उत्सव मनाने और वहां प्रयोग होने वाले मुखौटे अपने क्षेत्र में ले जाने की अनुमति दी।

इसीलिए हिलजात्रा को कुछ लोग पश्चिमी नेपाल के सोराड़ क्षेत्र की सांस्कृतिक देन मानते हैं, तो कुछ इसे मानसरोवर यात्रा से जुड़े यात्रियों के मनोरंजन की परंपरा से जोड़ते हैं।

कुमौड़ की हिलजात्रा आज भी इन लोककथाओं, आस्था और सदियों पुरानी सांस्कृतिक परंपराओं को जीवंत बनाए हुए है।

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⬇️पिथौरागढ़ नगर में आठूं मेले का भव्य शुभारंभ, मां गमरा की झांकी ने बांधा समां⬇️

नगर में लोकपर्व आठूं मेला 2026 का भव्य शुभारंभ पारंपरिक धार्मिक एवं सांस्कृतिक उत्साह के साथ हुआ। मेले के शुभारंभ के अवसर पर ग्राम टकाना-पितरौता से मां गमरा की भव्य झांकी निकाली गई। झांकी के साथ ग्रामवासियों और विद्यालयी छात्र-छात्राओं ने रैली में प्रतिभाग किया। जयकारों, भजनों और पारंपरिक गीतों से पूरा वातावरण भक्तिमय एवं लोक संस्कृति के रंग में रंगा नजर आया।

झांकी और रैली नगर के विभिन्न बाजार क्षेत्रों से होते हुए श्री रामलीला प्रबन्धकारिणी समिति मैदान पहुंची, जहां विधिवत रूप से मां गमरा की प्रतिमा स्थापित की गई। इस दौरान श्रद्धालुओं ने मां गमरा के दर्शन कर क्षेत्र की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना की।

आठूं मेले के शुभारंभ कार्यक्रम में ( प्रथम दिवस ) महापौर कल्पना देवलाल, सांसद अजय टम्टा, समिति अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह माहरा , व्यवस्थापक दीपक गुप्ता सहित विभिन्न जनप्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता, समिति के पदाधिकारी , कार्यकर्ता और बड़ी संख्या में नगरवासी मौजूद रहे।

आयोजन के दौरान लोक परंपराओं और धार्मिक आस्थाओं की झलक देखने को मिली। बच्चों और युवाओं की सहभागिता ने कार्यक्रम को विशेष रूप से आकर्षक बनाया। आयोजकों ने कहा कि आठूं मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि कुमाऊं की समृद्ध लोकसंस्कृति, परंपरा और सामुदायिक एकता का प्रतीक है। मेले के आगामी कार्यक्रमों को लेकर भी नगरवासियों में उत्साह बना हुआ है।
⬇️पिथौरागढ़ :- नगर के श्रीरामलीला मैदान में आज से सातूँ आठूँ की धूम , 26 अगस्त तक चलेगा आठूँ मेला !⬇️

🔯क्या है मान्यता ?🔯

सातूं-आठूं, जिसे गमरा-मैसर या गमरा उत्सव भी कहा जाता है, नेपाल और कुमाऊं की साझी लोकसंस्कृति का एक बेहद पुराना लोकपर्व है। माना जाता है कि इसकी परंपरा का मूल उद्गम पश्चिमी नेपाल के दार्चुला, बैतड़ी, डडेलधुरा और डोटी क्षेत्र से हुआ। काली नदी के आर-पार बसे गांवों के बीच सदियों से चले आ रहे रोजी-बेटी के रिश्तों के साथ यह परंपरा कुमाऊं तक पहुंची और आज पिथौरागढ़, गंगोलीहाट, बेरीनाग, बागेश्वर और चम्पावत के कई इलाकों में आस्था के साथ मनाई जाती है।

इस पर्व की सबसे खास पहचान है गौरा-महेश्वर की लोकगाथा। इन गाथाओं में भगवान शिव और पार्वती के विवाह से लेकर गणेश के जन्म तक की कथा मिलती है, लेकिन इसकी खूबसूरती यह है कि यहां शिव-पार्वती केवल देवता नहीं, बल्कि पहाड़ के आम जनजीवन का हिस्सा बनकर सामने आते हैं।

गाथा में महेश्वर को नदी किनारे बकरियां चराते हुए एक साधारण, मेहनतकश पहाड़ी किसान के रूप में देखा जाता है, जबकि गौरा एक ऐसी स्त्री के रूप में सामने आती हैं जो अपने ससुराल से मायके की ओर जाते हुए रास्ता भटकती हैं और रास्ते में पेड़-पौधों से अपना मार्ग पूछती हैं।

गौरा जब बांज, देवदार, हिंसालू, काफल, नींबू और नारंगी जैसे पेड़ों से रास्ता पूछती हैं, तो लोकगाथा में प्रकृति भी उसके साथ संवाद करती दिखाई देती है। वह पेड़ों को आशीर्वाद देती है - कहीं फूलों और फलों से लदे रहने का, तो कहीं मनुष्यों और देवताओं के काम आने का।

यही इस लोकपर्व की सबसे बड़ी खूबसूरती है - यह केवल धार्मिक कथा नहीं, बल्कि पहाड़ के मनुष्य, प्रकृति, परिवार और समाज के रिश्तों की कहानी भी है।

और शायद इसीलिए पहाड़ के लोक ने गौरा को अपनी बेटी/दीदी और महेश्वर को जवाईं/भीना मानकर अपने ही परिवार का हिस्सा बना लिया।

सातूं-आठूं इसलिए सिर्फ एक पर्व नहीं, यह काली नदी के दोनों किनारों को जोड़ती हमारी साझा स्मृति, संस्कृति और पहचान है।

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⬇️पिथौरागढ़ :- छः पट्टी सोर के आराध्य देव मोस्टा देवता का भव्य मेला 14 से 19 सितंबर तक⬇️

छः पट्टी सोर के आराध्य देव श्री मोस्टा देवता के मंदिर परिसर में 14 से 19 सितंबर 2026 तक छह दिवसीय भव्य मेले का आयोजन किया जाएगा। बीते दिवस हुई मेला समिति की बैठक उपरांत मेला संयोजक बिरेन्द्र बोहरा ने बताया कि मुख्य मेला 15 सितंबर को होगा, जबकि मेले का उद्घाटन 14 सितंबर को दोपहर 12:30 बजे किया जाएगा।

मेले में विभिन्न सांस्कृतिक दलों के साथ स्थानीय कलाकारों, विद्यालयों और क्षेत्र के गांवों के बुजुर्गों को भी आमंत्रित किया जाएगा। मेले के सफल आयोजन के लिए विभिन्न समितियों का गठन कर क्षेत्र के लोगों को जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं।
⬇️पिथौरागढ़ :- पूर्व दर्जा राज्यमंत्री एवं दिग्गज कांग्रेस नेता खजान चन्द्र गुड्डू को मातृ शोक⬇️

पूर्व दर्जा राज्यमंत्री खजान चन्द्र गुड्डू की माता श्रीमती कौशल्या देवी का 16 अगस्त की रात 11:30 बजे निधन हो गया। उनके निधन से परिवार और शुभचिंतकों में शोक की लहर है।

परिजनों के अनुसार, दिवंगत कौशल्या देवी का अंतिम संस्कार 17 अगस्त को प्रातः 9:30 बजे चित्रशिला घाट, रानीबाग में किया गया । परिवार ने उनके स्नेह और स्मृतियों को सदैव संजोए रखने की बात कही है।

सोर समाचार दिवंगत आत्मा की शांति की कामना करता है । ॐ शांति
Pithoragarh news :- ड्राई डे के दिन दुकान में छापा पड़ने से मचा हड़कम्प | Soar samachar | Breaking
पिथौरागढ़ :- CCTC फुटेज सोशल मीडिया में वायरल है । घटना 15 अगस्त 2026 की बताई जा रही है । इस पूरे घटनाक्रम में किसकी गलती है ?
⬇️पिथौरागढ़ :- मुनस्यारी क्षेत्र के मेजर हरीश सिंह देवली को सेना मेडल से सम्मान⬇️

मुनस्यारी के वल्थी गांव निवासी मेजर हरीश सिंह देवली को देश के प्रति अद्वितीय वीरता और उत्कृष्ट सेवा के लिए सेना मेडल से सम्मानित किया गया। मराठा इन्फैंट्री के अधिकारी मेजर हरीश सिंह वर्तमान में 17 राष्ट्रीय राइफल्स (RR) में सेवाएं दे रहे हैं। सैन्य सेवा के दौरान उनके साहस और उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें यह प्रतिष्ठित सम्मान मिला है। मेजर हरीश सिंह की इस उपलब्धि से वल्थी गांव समेत पूरे मुनस्यारी और उत्तराखंड में खुशी और गर्व का माहौल है। परिजनों और क्षेत्रवासियों ने उन्हें सम्मान मिलने पर बधाई देते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य और सुरक्षित सेवा की कामना की। परिवार ने कहा कि मेजर हरीश सिंह की उपलब्धि क्षेत्र के युवाओं के लिए भी प्रेरणादायी है और उन्होंने अपनी वीरता से गांव और प्रदेश का नाम गौरवान्वित किया है।
कल धूमधाम से मनाया गया 15 अगस्त… लेकिन क्या आप जानते हैं LSM Campus का नाम लक्ष्मण सिंह महर के नाम पर क्यों रखा गया? 🇮🇳

पिथौरागढ़ की आज़ादी की लड़ाई के इतिहास में श्री लक्ष्मण सिंह महर का नाम बेहद महत्वपूर्ण है। 24 जनवरी 1893 को पिथौरागढ़ के चैसर गांव में जन्मे महर जी ने कुली बेगार आंदोलन से लेकर सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आंदोलन तक अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष किया और कई बार जेल भी गए।

आजादी के बाद भी उन्होंने सीमांत क्षेत्र में शिक्षा, जनसेवा, स्कूल, अस्पताल और सड़कों के विकास के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया।

इन्हीं स्वतंत्रता संग्राम और समाजसेवा के योगदान को सम्मान देते हुए उत्तराखंड सरकार ने पिथौरागढ़ के राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय का नाम “लक्ष्मण सिंह महर राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय” रखा।

यानी जिस परिसर में आज हम आज़ादी का जश्न मनाते हैं, उसका नाम भी एक ऐसे स्वतंत्रता सेनानी की याद दिलाता है, जिन्होंने इस धरती पर आज़ादी की अलख जगाई थी। 🇮🇳

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⬇️पिथौरागढ़ : तेज बारिश से सड़क पर आया मलबा , सावधान⬇️

तेजम एवं मुनस्यारी के मध्य ला - झेकला क्षेत्र में भारी बारिश के चलते पहाड़ी से मलबा सड़क पर आ गया। इससे सड़क पर आवागमन प्रभावित हुआ है।
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