
जंग- ए- आज़ादी के एक सिपाही कामरेड प्रेम चंद प्रेमी का आज 105 वां जन्मदिन
मनमोहन सिंह 'दानिश'
बात है पांच अक्टूबर 1922 की। हमीरपुर ज़िले के पिछड़े से गांव झबड़ोल में एक अति गरीब किसान नौधा राम के घर एक लड़के का जन्म हुआ। पांच लड़कियों के बाद बेटा पैदा हुआ था। ज़ाहिर है घर में खुशी की एक लहर थी। इसी लिए उस लड़के का नाम प्रेम चंद रखा गया।
घर के हालात ऐसे नहीं थे कि उस बच्चे को माँ बाप स्कूल भेज पाते। इसलिए प्रेम चंद की स्कूली शिक्षा अधिक नहीं हो सकी। आज की तरह उस समय भी ग़रीब लोग अपनी ग़रीबी के लिए अपनी किस्मत को कोसते और किसी चमत्कार की आस में बाबाओं के चक्कर काटते। प्रेम चंद का परिवार भी कोई अपवाद नहीं था। उनकी मां उन्हें सिखाती, " बेटा जो भी साधु या भगवे कपड़ों में दिखे उसके पांव ज़रूर छूना"। और बालक प्रेम चंद यही करता।
कालांतर में उनका परिवार सोलन आ गया और प्रेम चंद जो कि दिमागी तौर पर बहुत ज़हीन थे उन्होंने चन्द्रदत्त शास्त्री से हिंदी की तालीम लेनी शुरू की। इस बीच उन्होंने दर्जी का काम भी सीखा। लेकिन वे बाबाओं के चक्कर में पड़े रहे। इस दौरान उन्हें स्वामी दयानंद की किताब सत्यार्थप्रकाश पढ़ने को मिल गई। उससे उनकी रूढ़िवादी सोच और कई विश्वास टूट गए। उन दिनों देश में आज़ादी की लड़ाई चल रही थी। प्रेम चंद जब 18 साल के थे तो उन्होंने कुराली में नेता जी सुभाष चंद्र बोस का भाषण सुना जो उन्होंने वहां आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में दिया था। नेता जी के भाषण का युवा प्रेम चंद पर गहरा असर पड़ा और वे गांधी जी के आंदोलन में शामिल हो गए। इस दौरान उन्होंने अपने नाम प्रेम चंद के साथ उपनाम "नफरत" जोड़ लिया। उनके दोस्त उन्हें प्रेम चंद "नफरत" के नाम से बुलाने लगे। फिर कुछ दोस्तों ने कहा कि "नफरत" सही नहीं है इसलिए उन्होंने उनके नाम के साथ "नफ़रत" को हटा कर "प्रेमी" लगा दिया। फिर वे पूरी उम्र प्रेम चंद प्रेमी के नाम से रहे। उस समय देश भर में रियासतों के राजाओं के खिलाफ प्रजामंडल गठित किए जा रहे थे। उन्होंने ने भी अपने साथियों के साथ मिल कर बघाट रियासत में प्रजामंडल की स्थापना में बड़ी भूमिका निभाई। सोलन यानी बघाट में प्रजामंडल 1944-45 में बना। उस समय नानक चंद सूद को प्रधान, चंदन लाल को उसका सचिव चुना गया। उनके अलावा प्रेम चंद प्रेमी, सोमदेव, कामता प्रसाद गुप्ता, कुलानंद पंत और ज्ञान चंद टूटू को सदस्य बनाया गया। उस समय बघाट के राजा दुर्गा सिंह थे। उनका दवाब प्रजामंडल के सदस्यों और परिवारों पर पड़ने लगा। इसी दवाब के चलते उनके कुछ साथी निष्क्रिय भी हो गए थे। पर प्रजामंडल अपना काम करता रहा।
इस दौरान एक घटना घटी की घूंढ रियासत के राणा को उनकी रियासत से बाहर निकाल दिया गया तो वो बड़ोग में किराए का मकान ले कर रहने लगे। प्रेम चंद प्रेमी उससे मिले तो उसने कहा कि मेरे पास काफी हथियार हैं जिनसे शिमला में अंग्रेजों के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध किया जा सकता है। इसके बाद प्रेमी ने सोलन में ख्याली राम से बात की। वो भी तैयार हो गये। इस बारे में प्रेमी और उनके दूसरे साथियों ने अरुणा आसफ अली को खत भी लिखा। प्रोग्राम यह बना कि शिमला जाने वाली रेल लाइन की सभी सुरागों को उड़ा दिया जाए ताकि कोई अंग्रेज़ शिमला न जा सके। लेकिन गांधी जी के अहिंसा के संदेश से प्रेरित हो कर उन्होंने यह इरादा छोड़ दिया।
इसी दौरान उन्होंने कॉर्ल मार्क्स की किताब दास कैपिटल को पढ़ लिया और आज़ादी के बाद वे कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ गए और ता उम्र मजदूरों, किसानों और शोषित वर्ग के हितों के लिए लड़ते रहे। हिमाचल प्रदेश में कम्युनिस्ट पार्टी बनाने में उनका बहुत बड़ा योग दान है। इस दौरान उन्होंने सोलन को छोड़ धर्मपुर को आपना घर और कर्म भूमि बना लिया। उन्होंने कभी उसूलों से समझौता नहीं किया। आखिर 12 फरवरी 2008 को 85 वर्ष की आयु में वे दुनिया छोड़ गए और साथ ही छोड़ गए एक बहुत बड़ा इतिहास।
आज उनके 105 वें जन्मदिन पर उन्हें शत् शत् नमन।