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RAJESH KUMAR

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पाँवटा साहिब पहुंचे पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर
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स्कूल प्रबंधन ने महिला के खिलाफ की थी FIR दर्ज, समाजसेवी और महिला पर अब उठे कई सवाल
GDC पांवटा साहिब में सर्वसम्मति से पत्रकार श्यामलाल पुंडीर बने पीटीए प्रधान…

राजकीय महाविद्यालय पांवटा साहिब में आज अभिभावक-शिक्षक संघ की आम सभा का आयोजन किया गया। इससे पूर्व पिछले माह दूसरे शनिवार को भी आम सभा बुलाई गई थी, लेकिन आवश्यक कोरम पूरा न होने के कारण सभा को आगामी बैठक तक स्थगित कर दिया गया था। इस बार पर्याप्त संख्या में सदस्यों ने भाग लिया, जिसके बाद सभा की कार्यवाही पूर्ण की गई। महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. जगदीश चौहान ने पिछली कार्यकारिणी को भंग करते हुए नई कार्यकारिणी के गठन की प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए। इसके बाद सदस्यों ने सर्वसम्मति से नई  कार्यकारिणी का गठन किया।

सर्वसम्मति से गठित नई कार्यकारिणी में श्यामलाल पुंडीर को अध्यक्ष, महेंद्र कपूर को उपाध्यक्ष, डॉ. सुशील तोमर को सचिव तथा प्रवेश कुमार संयुक्त सचिव , कोषाध्यक्ष रूप सिंह चौहान को चुना गया। 
इसके अलावा मोहन तोमर, नियति ठाकुर, प्रो. विमी रानी, प्रो. अमिता जोशी और प्रो. कमलेश शर्मा को सदस्य बनाया गया।
नवनिर्वाचित अध्यक्ष श्यामलाल पुंडीर ने अपने वक्तव्य में महाविद्यालय के प्राचार्य, समस्त स्टाफ सदस्यों और  सदस्यों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि भविष्य में पीटीए महाविद्यालय प्रशासन के साथ मिलकर महाविद्यालय के विकास, कल्याण और विद्यार्थियों के हित में कार्य करेगी। 

इस मौके पर श्यामलाल पुंडीर ने कहा कि कॉलेज में प्रोफेशनल कोर्स करने वाले छात्रों के लिए प्लेसमेंट की व्यवस्था बहुत जरूरी है। इसके लिए सरकार से बात करेंगे
कार्यक्रम का संचालन पूर्व सचिव डॉ. डी.एस. तोमर ने किया। आम सभा के बाद प्राचार्य कार्यालय में पीटीए की पहली बैठक आयोजित की गई, जिसमें महाविद्यालय से जुड़े विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई। बैठक में महाविद्यालय के विकास एवं विद्यार्थियों के हित से जुड़े मुद्दों पर मिलकर कार्य करने पर जोर दिया गया।
अभिनेत्री उर्मिला सनावर ने यह पोस्ट साँझा की है,
उनका facebook अकाउंट एक बार फिर से बंद कर दिया गया है...
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तिरुपति ग्रुप की CSR पहल: पांवटा साहिब के पशु चिकित्सालय को ₹20 लाख की सहायता

पांवटा साहिब, सिरमौर: तिरुपति ग्रुप ने अपने कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) के तहत पशु स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए उप-मंडलीय पशु चिकित्सालय, पांवटा साहिब को आधुनिक चिकित्सा उपकरण उपलब्ध कराने हेतु ₹20 लाख की वित्तीय सहायता प्रदान की है।

इस CSR पहल के अंतर्गत अस्पताल में अत्याधुनिक Haematology Blood Cell Counter Model “MEK 6550 J/K” एवं NX 600 Fuji Dri Chemistry Fully Automated Medical Equipment उपलब्ध कराए गए हैं। इन आधुनिक उपकरणों के माध्यम से पशुओं की विभिन्न बीमारियों की जांच एवं निदान अधिक सटीक और शीघ्रता से किया जा सकेगा, जिससे क्षेत्र के पशुपालकों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं प्राप्त होंगी।

इन आधुनिक चिकित्सा उपकरणों का शुभ उद्घाटन अरुण गोयल जी द्वारा किया गया। इस अवसर पर उपस्थित गणमान्य व्यक्तियों ने तिरुपति ग्रुप की इस सराहनीय सामाजिक पहल की प्रशंसा करते हुए कहा कि यह योगदान क्षेत्र की पशु चिकित्सा स्वास्थ्य सेवाओं के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

तिरुपति ग्रुप सदैव समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को प्राथमिकता देते हुए शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण एवं जनकल्याण के क्षेत्र में निरंतर योगदान देता रहा है। कंपनी की यह पहल “सेवा और सामाजिक विकास” के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

₹20 लाख की इस CSR सहायता से पांवटा साहिब एवं आसपास के क्षेत्रों में पशु चिकित्सा सुविधाओं को नई मजबूती मिलने की उम्मीद है।
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भक्ति, प्रेम और खुशियों से भरा यह पावन पर्व आपके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लेकर आए।
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अडानी के सेब रेट से बागवान नाराज! मंडी में ₹2800 पेटी, कॉर्पोरेट रेट पड़े कम
हिमाचल में बारिश बनी आफत! दुकानों में घुसा सैलाब, कालका-शिमला फोरलेन पर भारी लैंडस्लाइड
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*भूतपूर्व सैनिक संगठन पाँवटा-शिलाई का संघर्ष लाया रंग! चकराता से पांवटा साहिब में पहुंची मोबाइल सीएसडी केंटीन*

हिमाचल प्रदेश में जिला सिरमौर के पांवटा साहिब में मोबाइल सीएसडी कैंटीन पहुंची और क्षेत्र के भूतपूर्व सैनिकों, वीरनारियों, सैनिकों और उनके आश्रितों को सीएसडी कैंटीन से घरेलू सामान मुहैया करवाया गया। भूतपूर्व सैनिक एवं आश्रित सुबह से ही दूरदराज के गांवों से सामान लेने के लिए सेनिक रेस्ट हाउस में एकत्रित हुए।  भूतपूर्व सैनिक संगठन पाँवटा साहिब-शिलाई क्षेत्र के पदाधिकारियों ने एस्टेब्लिशमेंट की तरफ से सामान लेकर पुहंचे सैनिकों का व्यवस्था में भरपूर सहयोग किया। प्रात: 8 बजे से ही सामान वितरित कर शुरुआत की गई।
आपको बताते चलें कि इस सुविधा का फायदा उठाने के लिए क्षेत्र के वीरनारियों, भूतपूर्व सैनिकों तथा उनके आश्रितों को नाहन या देहरादून जाना पड़ता था। जिसमें कि आने जाने में काफी समय व काफी खर्चा लगता था।
भूतपूर्व सैनिक संगठन पाँवटा-शिलाई, वीरनारियों, सैनिकों तथा उनके आश्रितों ने इलाके को दुबारा मोबाइल सीएसडी कैंटीन की सुविधा से जोड़ने पर खुशी जताई साथ ही भूतपूर्व सैनिक संगठन पाँवटा-शिलाई ने एस्टेब्लिशमेंट का आभार व धन्यवाद व्यक्त किया क्योंकि इनके अथक प्रयासों से ही यह काम सफल हो पाया है। संगठन ने उम्मीद जताई कि यह सुविधा आगे भी निरंतर जारी रहेगी।
भूतपूर्व सैनिक संगठन पांवटा साहिब एवं शिलाई क्षेत्र के अध्यक्ष करनैल सिंह, सचिव ओम प्रकाश, कोषाध्यक्ष इंद्र नेगी, वीरेंद्र सिंह चौहान, नरेंद्र ठुंडू, मामराज चौहान, सुनील आदि ने बताया कि संगठन के लगातार आग्रह के बाद यह सुविधा फिर से बहाल हुई है। इससे क्षेत्र के पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों को आवश्यक सामान की सुविधा नजदीक ही उपलब्ध हो सकेगी।
विभागों की मिलीभगत से ऐसे चलता है अवैध खनन का खेल 

मानसून के दौरान पर्यावरण की सुरक्षा, बाढ़ के खतरे को टालने और नदियों में प्राकृतिक रूप से खनिजों के पुनर्भरन के लिए 15 सितम्बर तक खनन गतिविधियों पर सरकार ने पूर्ण प्रतिबन्ध लगाया है बावजूद इसके बांगरण के समीप गिरी नदी में रोजाना अवैध रूप से खनन किया जा रहा था, आज सुबह करीब 9 बजे एक तरफ खाखी बर्दी पहने कर्मचारी अपनी ड्यूटी के दौरान टाइम पास कर रहा था तो दूसरी तरफ खनन सामग्री की चोरी चल थी जिससे साफ जाहिर हो रहा था की किस तरह से कर्मचारियों और खनन माफियाओं की मिली भगत से प्रतिबन्ध के बाद भी अवैध खनन का खेल चल रहा है, निचले स्तर पर मिलीभगत से सब काम चल रहा है
हिस्ट्रीशीटर से दूरी की हिदायत… फिर SHO की गाड़ी में कैसे पहुंचा? वायरल वीडियो ने मचाई सनसनी

वरिष्ठ तेज-तर्रार IPS रमन कुमार मीणा की हिदायत के बावजूद कथित नजदीकी पर उठे सवाल, पहले भी हिस्ट्रीशीटर के चक्कर में एक SHO को होना पड़ा था लाइन हाजिर!

पांवटा साहिब।
सिरमौर पुलिस में एक वायरल वीडियो ने ऐसा सवाल खड़ा कर दिया है, जिसका जवाब अब पुलिस महकमे से मांगा जा रहा है। वीडियो में कथित हिस्ट्रीशीटर पुलिस की गाड़ी में बैठे हुए नजर आ रहा है । दावा है कि जिस समय यह वीडियो बनाया गया, पुलिस वाहन सरकारी ड्यूटी पर था।
मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि सिरमौर पुलिस को वरिष्ठ तेज-तर्रार IPS अधिकारी रमन कुमार मीणा की ओर से हिस्ट्रीशीटरों से अनावश्यक नजदीकी से बचने की हिदायत दिए जाने की बात सामने आती रही है। ऐसे में पुलिस वाहन में कथित हिस्ट्रीशीटर की मौजूदगी का वीडियो कई सवाल खड़े कर रहा है।

पहले भी उठ चुके हैं ऐसे सवाल

सूत्रों के मुताबिक, हिस्ट्रीशीटर से जुड़े एक पुराने मामले में तत्कालीन SHO को लाइन हाजिर तक होना पड़ा था। यानी पुलिस विभाग के स्तर पर पहले भी यह संदेश स्पष्ट रहा है कि हिस्ट्रीशीटरों से पुलिस की नजदीकी को किसी भी कीमत पर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

इसके बावजूद अब यदि वायरल वीडियो में पुलिस की ड्यूटी वाली गाड़ी में ऐसे शख्स की मौजूदगी की पुष्टि होती है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर उन्हें पुलिस वाहन में किस आधार पर बैठाया गया था?

क्या रौब जमाने के लिए पुलिस वाहन का इस्तेमाल?

वीडियो को लेकर एक और गंभीर आरोप सामने आ रहा है। चर्चा है कि पुलिस वाहन में बैठकर कथित तौर पर लोगों के बीच प्रभाव और रौब दिखाने की कोशिश की जा रही होगी। यदि यह आरोप सही पाया जाता है तो मामला सिर्फ किसी व्यक्ति के पुलिस वाहन में बैठने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह सरकारी वाहन के इस्तेमाल और पुलिस की छवि से भी जुड़ जाएगा।

वीडियो पहुंचा वरिष्ठ अधिकारियों तक!

बताया जा रहा है कि किसी व्यक्ति ने इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो रिकॉर्ड कर लिया और उसे वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों तक पहुंचाया। यही वीडियो अब पुलिस महकमे में चर्चा का विषय बना हुआ है। इसी बीच पांवटा साहिब के SHO के तबादले ने घटनाक्रम को और ज्यादा चर्चा में ला दिया है। हालांकि, तबादला इसी वीडियो या कथित संरक्षण के कारण हुआ—इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी सामने नहीं आई है। इसलिए इसे फिलहाल एक गंभीर सवाल और जांच का विषय ही माना जाना चाहिए।

अब पुलिस से जवाब की उम्मीद

पुलिस विभाग को स्पष्ट करना चाहिए कि वीडियो कब का है, वाहन किस ड्यूटी पर था, उसमें हिस्ट्रीशीटर किस आधार पर मौजूद था और क्या संबंधित अधिकारी को इसकी जानकारी या अनुमति थी।

सबसे बड़ा सवाल यही है—

जब वरिष्ठ स्तर पर हिस्ट्रीशीटरों से दूरी बनाए रखने की हिदायत की बात सामने आती रही है, तो फिर पुलिस की ड्यूटी वाली गाड़ी में उसकी मौजूदगी आखिर कैसे हुई?

अब देखना होगा कि पुलिस विभाग इस वायरल वीडियो को महज एक तस्वीर/वीडियो मानकर छोड़ता है या पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष विभागीय जांच कर जिम्मेदारी तय करता है।
सतौन के समीप गिरी नदी में अवैध खनन जारी, समाजसेवी नाथुराम चौहान ने साँझा की वीडियो
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उद्योग मंत्री 30 अगस्त को टिटयाना में सुनेंगे लोगों की समस्याएं

नाहन 29 अगस्त। उद्योग, संसदीय कार्य तथा श्रम एवं रोजगार मंत्री हर्षवर्धन चौहान अपने जिला सिरमौर के प्रवास के दौरान 30 अगस्त, 2026 को प्रातः टिटयाना में लोगों की समस्याएं सुनेंगे। यह जानकारी सरकारी प्रवक्ता ने दी।
हिंदू धर्म में ‘काला महीना’ : आस्था, परंपरा और आध्यात्मिक महत्व 
                                                                                                                                                                                                                          
हिंदू धर्म में वर्ष के प्रत्येक महीने का अपना धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। इन्हीं में एक विशेष अवधि को आम बोलचाल में ‘काला महीना’ कहा जाता है। हालांकि ‘काला महीना’ कोई सर्वमान्य शास्त्रीय नाम नहीं है, विभिन्न क्षेत्रों में लोग अलग-अलग धार्मिक अवधियों के लिए इस शब्द का प्रयोग करते हैं। कई स्थानों पर इसे श्रावण के बाद आने वाले भाद्रपद मास, तो कहीं अधिकमास, मलमास या खरमास जैसी अवधारणाओं से जोड़कर देखा जाता है। इसलिए ‘काला महीना’ शब्द का अर्थ क्षेत्र और परंपरा के अनुसार अलग हो सकता है। हिंदू परंपरा में कुछ निश्चित अवधियों को ऐसे समय के रूप में माना गया है, जब सांसारिक शुभ कार्यों की अपेक्षा आत्मचिंतन, संयम, पूजा-पाठ और आध्यात्मिक साधना पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए। ऐसी मान्यताओं के पीछे यह विचार है कि मनुष्य को वर्ष में कुछ समय अपनी भौतिक व्यस्तताओं से विराम लेकर अपने भीतर झांकना चाहिए। इसी कारण कई परिवारों में इस अवधि के दौरान विवाह, गृहप्रवेश, मुंडन जैसे मांगलिक कार्यों से परहेज किया जाता है। हालांकि यह परंपरा हर स्थान और संप्रदाय में समान नहीं है तथा किसी शुभ कार्य के लिए स्थानीय पंचांग और विद्वान की सलाह ली जाती है। विवाह के बाद आने वाली उस विशेष अवधि के लिए प्रयोग होता है, तो कुछ परिवारों में मान्यता होती है कि नई दुल्हन को लगभग एक महीने के लिए मायके भेज दिया जाता है और वह उस अवधि में ससुराल में नहीं रहती। इसे कई जगह परंपरा, पारिवारिक रीति या स्थानीय मान्यता के रूप में निभाया जाता है। भारतीय संस्कृति में विवाह केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं, बल्कि दो परिवारों और सामाजिक परंपराओं का मिलन माना जाता है। विवाह के बाद नवविवाहिता के जीवन में अनेक परिवर्तन आते हैं। इसी क्रम में हिमाचल प्रदेश सहित उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में एक ऐसी लोकपरंपरा देखने को मिलती है, जिसमें विवाह के बाद ‘काला महीना’ पड़ने पर नई दुल्हन को कुछ समय के लिए मायके भेजने की परंपरा रही है। कई परिवारों में इसे लगभग एक महीने तक ससुराल में न रहने और मायके में रहने से जोड़ा जाता है। हालांकि यह समझना जरूरी है कि ‘काला महीना’ हिंदू धर्म में पूरे देश के लिए निर्धारित कोई एक समान शास्त्रीय नियम नहीं है। इसका अर्थ और इससे जुड़ी परंपराएं क्षेत्र, समुदाय और परिवार के अनुसार बदलती हैं। इसलिए नवविवाहिता के मायके जाने की परंपरा को भी सार्वभौमिक धार्मिक आदेश के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। पुराने समय में विवाह के बाद लड़की का जीवन अचानक पूरी तरह बदल जाता था। वह नए घर, नए लोगों और नई जिम्मेदारियों के बीच आती थी। ऐसे में कुछ समय के लिए मायके जाना उसे भावनात्मक रूप से सहज होने का अवसर देता था। मायका उसके लिए केवल जन्मस्थान नहीं, बल्कि भावनात्मक सुरक्षा और अपनत्व का स्थान भी होता था। इसलिए इस परंपरा को एक दृष्टि से नवविवाहिता को अपने माता-पिता और परिवार के साथ समय बिताने का अवसर देने वाली सामाजिक व्यवस्था के रूप में भी देखा जा सकता है। कई क्षेत्रों में इस परंपरा को धार्मिक मान्यताओं और पंचांग की विशेष अवधियों से जोड़ा गया है। कुछ परिवारों में ऐसी अवधि के दौरान विवाह के बाद के कुछ मांगलिक कार्यों को सीमित रखने की परंपरा रही है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात यह है कि हिंदू धर्मग्रंथों में ऐसा कोई सार्वभौमिक विधान नहीं मिलता कि हर नई दुल्हन को ‘काला महीना’ पड़ने पर अनिवार्य रूप से एक महीने तक ससुराल छोड़कर मायके में ही रहना चाहिए। इसलिए इसे स्थानीय लोकाचार और पारिवारिक परंपरा के रूप में समझना अधिक उचित है। हिमाचल प्रदेश की संस्कृति में लोकविश्वासों और पारिवारिक परंपराओं की विशेष भूमिका रही है। पहाड़ी समाज में मौसम, कृषि चक्र, धार्मिक पर्व और सामाजिक जीवन एक-दूसरे से गहराई से जुड़े रहे हैं। पुराने समय में विवाह के बाद लड़की को कुछ समय मायके भेजने की व्यवस्था के पीछे व्यावहारिक कारण भी रहे होंगे। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और सीमित यातायात के दौर में बेटी का मायके आना-जाना आज की तरह आसान नहीं था। ऐसे अवसर पारिवारिक मेल-मिलाप का माध्यम भी बनते थे। इसे सीधे तौर पर वैज्ञानिक नियम कहना उचित नहीं होगा। हालांकि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो विवाह के बाद कुछ समय मायके में बिताना नवविवाहिता के लिए भावनात्मक सहारा और मानसिक सहजता प्रदान कर सकता है। नए परिवार में सामंजस्य स्थापित करने में समय लगता है। मायके के लोगों से बातचीत, पुराने वातावरण में कुछ समय बिताना और अपने अनुभव साझा करना भावनात्मक संतुलन में सहायक हो सकता है। लेकिन इसे किसी निश्चित “एक महीने” की वैज्ञानिक आवश्यकता नहीं माना जा सकता। यदि किसी परिवार में नवविवाहिता को कुछ समय मायके भेजने की परंपरा है और वह स्वयं भी इसे खुशी से स्वीकार करती है, तो यह परिवारों के बीच संबंध मजबूत करने का सुंदर माध्यम बन सकती है। लेकिन यदि इसे भय, अशुभता या दबाव के रूप में लागू किया जाए, तो परंपरा अपना सकारात्मक उद्देश्य खो सकती है। नवविवाहिता को ससुराल में रहना है या मायके जाना है, यह निर्णय परिवार की परंपरा के साथ-साथ उसकी इच्छा, परिस्थितियों और सुविधा को ध्यान में रखकर होना चाहिए। आज विवाह के बाद महिलाएं शिक्षा, नौकरी और व्यक्तिगत जीवन में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। संयुक्त परिवारों की जगह छोटे परिवार बढ़ रहे हैं और आवागमन भी आसान हुआ है। ऐसे में पुरानी परंपराओं का स्वरूप भी बदल रहा है। अब कई परिवार ‘काला महीना’ जैसी मान्यताओं को कठोर नियम के बजाय परिवार से मिलने-जुलने और परंपरा निभाने के अवसर के रूप में देखते हैं। ‘काला महीना’ और नवविवाहिता के मायके जाने की परंपरा भारतीय लोकसंस्कृति की उन अनेक परंपराओं में से एक है, जिनमें धार्मिक विश्वास के साथ सामाजिक और पारिवारिक भावनाएं भी जुड़ी हैं। इसे पूरे हिंदू धर्म का अनिवार्य नियम मानना सही नहीं होगा। इसका वास्तविक महत्व इस बात में है कि परंपरा परिवारों को जोड़ती है, बेटी को मायके से जोड़े रखती है और विवाह के बाद बदलते जीवन में भावनात्मक सहारा देती है। समय बदलने के साथ परंपराओं का स्वरूप बदल सकता है, लेकिन उनके पीछे छिपी संवेदना और रिश्तों की गर्माहट को बचाए रखना ही भारतीय संस्कृति की वास्तविक खूबसूरती है।                                                                                                                                                                                                                                                                                

लेखक:  राजन कुमार शर्मा
गांव डुगली, उप तहसील लंबलू,  
जिला हमीरपुर हिमाचल प्रदेश-177029