
मनुष्य की बढ़ती महत्वाकांक्षा और नैतिक संतुलन की आवश्यकता
आज विज्ञान, प्रौद्योगिकी और सत्ता के विस्तार के इस युग में मनुष्य अपनी उपलब्धियों पर स्वाभाविक रूप से गर्व महसूस कर रहा है। यह गर्व तब तक उचित है, जब तक उसमें विनम्रता, उत्तरदायित्व और नैतिकता का संतुलन बना रहे। किंतु जब मनुष्य स्वयं को सर्वशक्तिमान मानने लगता है और यह समझ बैठता है कि उसके ऊपर किसी नैतिक या आध्यात्मिक अनुशासन का प्रभाव नहीं है, तभी पतन की प्रक्रिया आरंभ हो जाती है।
वर्तमान समाज में यह प्रवृत्ति भी देखने को मिलती है कि एक राज्य, एक संपत्ति और एक विश्वास के नाम पर लोग अपने ही सिद्धांतों और मूल्यों से समझौता कर लेते हैं। सत्ता की आकांक्षा में वादे बदल जाते हैं, संपत्ति के लिए संबंधों में दरार आ जाती है और स्वार्थ के कारण विश्वासघात सामान्य होता जा रहा है। यह केवल राजनीतिक समस्या नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक और नैतिक संकट भी है।
राजनीति का मूल उद्देश्य जनसेवा, न्याय और विकास होना चाहिए। परंतु जब राजनीति केवल सत्ता प्राप्ति का साधन बन जाती है, तब जनता का विश्वास कमजोर होने लगता है। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति जनता का भरोसा है, और यदि यही भरोसा डगमगा जाए, तो किसी भी व्यवस्था की नींव कमजोर हो जाती है।
सामाजिक स्तर पर भी स्थिति चिंताजनक है। परिवारों में स्वार्थ बढ़ रहा है, संबंधों में विश्वास घट रहा है और नैतिक मूल्यों का स्थान व्यक्तिगत लाभ लेता जा रहा है। धन और पद की प्रतिस्पर्धा में अनेक लोग यह भूल जाते हैं कि जीवन की सबसे बड़ी पूंजी विश्वास, ईमानदारी और चरित्र है। एक बार विश्वास टूट जाए, तो उसे पुनः स्थापित करना अत्यंत कठिन हो जाता है।
भारतीय संस्कृति सदैव यह सिखाती रही है कि मनुष्य कर्म कर सकता है, परंतु अंतिम निर्णय समय, प्रकृति और ईश्वर के अधीन होता है। इतिहास इस तथ्य का साक्षी है कि अहंकार चाहे कितना भी प्रबल क्यों न हो, उसका अंत प्रायः विनाश में ही होता है। रावण, कंस और दुर्योधन जैसे पात्र इसी सत्य की स्मृति कराते हैं कि जब शक्ति मर्यादा से बाहर चली जाती है, तो उसका परिणाम निश्चित रूप से पतन होता है।
अतः आवश्यकता इस बात की है कि व्यक्ति, समाज और राजनीति—तीनों अपने मूल्यों की ओर लौटें। सत्ता सेवा का माध्यम बने, संपत्ति का उपयोग समाजहित में हो और विश्वास को सर्वोच्च मूल्य माना जाए। यही किसी भी राष्ट्र की स्थायी प्रगति का आधार है।
अंततः, मनुष्य भगवान नहीं बन सकता। वह अपनी बुद्धि और परिश्रम से असाधारण उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकता है, किंतु प्रकृति, समय और कर्म के शाश्वत नियमों से ऊपर नहीं उठ सकता। इसलिए अहंकार के स्थान पर विनम्रता, विश्वासघात के स्थान पर विश्वास और स्वार्थ के स्थान पर लोककल्याण ही एक सशक्त समाज और राष्ट्र की पहचान है।