
युगद्रष्टा जनकवि ‘गिर्दा’: पहाड़ के संघर्षों की अमर आवाज़
पुण्यतिथि विशेष | 22 अगस्त
उत्तराखंड के जनजीवन, लोकसंस्कृति और जनआंदोलनों की बात गिर्दा के बिना अधूरी है। जब पहाड़ में जंगल, जमीन, पानी, रोजगार और पहचान के सवालों पर जनता सड़कों पर उतरी, तब एक कवि केवल कविता लिखने तक सीमित नहीं रहा। वह खुद जनता के बीच खड़ा हुआ, हुड़के की थाप पर गीत गाता रहा और अपनी आवाज को संघर्ष की आवाज बना दिया।
वह थे गिरीश चंद्र तिवाड़ी ‘गिर्दा’—कुमाऊं के वह जनकवि, संस्कृतिकर्मी, रंगकर्मी और आंदोलनकारी, जिनके गीत उत्तराखंड के अनेक जनसंघर्षों की सांस्कृतिक पहचान बन गए।
सितंबर 1945 में जन्मे, संघर्षों के बीच बने ‘गिर्दा’
गिर्दा का जन्म सितंबर 1945 में अल्मोड़ा जिले के हवालबाग क्षेत्र के ज्योली गांव में हुआ था। उपलब्ध प्रमुख जीवनी स्रोतों में उनकी जन्मतिथि 9 सितंबर 1945 दर्ज है, जबकि कुछ अन्य स्रोत 10 सितंबर बताते हैं। उनके पिता हंसादत्त तिवाड़ी और माता जीवंती तिवाड़ी थीं।
उनका जीवन शुरू से ही संघर्षों से भरा रहा। आजीविका के लिए उन्होंने अलग-अलग काम किए। लखनऊ, अलीगढ़, पीलीभीत और पूरनपुर में रिक्शा चलाने से लेकर सरकारी विभागों में काम करने तक का अनुभव उनके जीवन का हिस्सा रहा। बाद में 1967 में वह भारत सरकार के गीत एवं नाटक प्रभाग से जुड़े। रंगमंच, लोकसंगीत और सामाजिक सरोकारों ने उनके व्यक्तित्व को वह दिशा दी, जिसने उन्हें आगे चलकर जनकवि ‘गिर्दा’ बना दिया।
हुड़के की थाप बनी प्रतिरोध की आवाज
गिर्दा की सबसे अलग पहचान थी—उनका हुड़का।
उच्चकुलीन ब्राह्मण परिवार से आने के बावजूद उन्होंने हुड़का हाथ में लेकर लोकमंच और आंदोलनों में उसका इस्तेमाल किया। उस समय हुड़का बजाने की परंपरा सामाजिक रूप से एक विशेष समुदाय से जोड़ी जाती थी। गिर्दा ने इस सामाजिक विभाजन को चुनौती देते हुए लोकवाद्य को जनजागरण का माध्यम बनाया।
उनके लिए लोककला केवल मनोरंजन नहीं थी। वह समाज को जगाने और सवाल पूछने का माध्यम थी।
चिपको से उत्तराखंड आंदोलन तक
गिर्दा का जुड़ाव केवल साहित्य तक सीमित नहीं रहा। वन आंदोलन और चिपको आंदोलन के दौर में उन्होंने गीतों के माध्यम से जंगल और हिमालय के सवालों को जनता तक पहुंचाया। 1977 के वन आंदोलन के दौरान उनका गीत “आज हिमाल तुमन कैं धत्यूंछ, जागो जागो हो मेरा लाल” व्यापक रूप से चर्चित हुआ।
इसके बाद ‘नशा नहीं, रोजगार दो’ आंदोलन, नदी बचाओ जैसे जनसंघर्षों और बाद में उत्तराखंड राज्य आंदोलन में भी उनकी सक्रिय सांस्कृतिक भूमिका रही। 1984 के नशा विरोधी आंदोलन में जनगीत, नुक्कड़ नाटक और सांस्कृतिक यात्राओं के माध्यम से जनजागरण का काम हुआ, जिसमें गिर्दा की महत्वपूर्ण भूमिका बताई जाती है।
‘जैंता एक दिन तो आलो...’ ने भरी आंदोलन में ऊर्जा
उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौर में गिर्दा का गीत—
“ओ जैंता एक दिन तो आलो, उ दिन यो दुनी में...”
आंदोलनकारियों के बीच बेहद लोकप्रिय हुआ। उनके गीतों में केवल राज्य की मांग नहीं, बल्कि एक न्यायपूर्ण और जनपक्षीय समाज की कल्पना भी दिखाई देती थी।
यही वजह थी कि गिर्दा के गीत आंदोलन की सभाओं, जुलूसों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का अभिन्न हिस्सा बन गए।
‘बोल व्यापारी’ में विकास के मॉडल पर सवाल
गिर्दा की रचनाओं की सबसे बड़ी ताकत उनकी दूरदृष्टि थी। उनके चर्चित गीत ‘बोल व्यापारी’ में प्रकृति के अंधाधुंध दोहन और विकास की उस सोच पर सवाल उठाया गया, जिसमें पहाड़ की नदियों, जंगलों और जमीन को केवल संसाधन समझा जाता है।
उनकी रचनाओं में आने वाली पर्यावरणीय चुनौतियों की चेतावनी आज भी पहाड़ के मौजूदा संकटों के संदर्भ में प्रासंगिक महसूस होती है। हालांकि यह कहना कि गिर्दा ने किसी खास भविष्य की आपदा की “भविष्यवाणी” कर दी थी, तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। बेहतर यह है कि उनकी रचनाओं को पर्यावरणीय चेतना और विकास के मॉडल पर सवाल उठाने वाली दूरदर्शी रचनाएं कहा जाए।
साहित्य और रंगमंच में भी बड़ा योगदान
गिर्दा केवल आंदोलनकारी कवि नहीं थे। वह रंगकर्मी और लेखक भी थे। उन्होंने ‘नगाड़े खामोश हैं’ और ‘धनुष यज्ञ’ जैसे नाटकों पर काम किया। ‘शिखरों के स्वर’, ‘हमारी कविता के आखर’, ‘रंग डारि दियो हो अलबेलिन में’ और ‘उत्तराखंड काव्य’ जैसी कृतियों से भी उनका साहित्यिक योगदान जुड़ा है।
उनका साहित्य पहाड़ के आम आदमी, उसकी पीड़ा, संघर्ष, संस्कृति और सामाजिक विसंगतियों से गहराई से जुड़ा रहा।
सादगी, फक्कड़पन और जनता से सीधा रिश्ता
गिर्दा के व्यक्तित्व की एक खास पहचान उनका फक्कड़पन था। वह बड़े मंचों के कवि होने के बावजूद आम लोगों के बीच सहजता से घुल-मिल जाते थे। उनके बारे में लिखने वाले कई लोगों ने उनके इसी सरल और बेबाक व्यक्तित्व को रेखांकित किया है।
उनके लिए कविता किताब के पन्नों तक सीमित नहीं थी। कविता तब सार्थक थी जब वह जनता की आवाज बन सके।
22 अगस्त 2010 को थम गई आवाज, लेकिन गीत आज भी जिंदा
गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’ का निधन 22 अगस्त 2010 को हल्द्वानी में हुआ। उनके निधन के बाद उत्तराखंड की सांस्कृतिक और आंदोलनकारी दुनिया में एक बड़ा खालीपन महसूस किया गया।
उनके योगदान को उत्तराखंड सरकार ने भी सम्मान दिया। 2022 में उन्हें मरणोपरांत ‘उत्तराखंड गौरव सम्मान’ से सम्मानित किया गया। इसलिए पुराने लेखों में मिलने वाला “निधन के 11 साल बाद” वाला उल्लेख सही नहीं है; 2010 से 2022 तक लगभग 12 वर्ष का अंतर है।
गिर्दा को याद करना, सवालों को जिंदा रखना है
गिर्दा की पुण्यतिथि केवल श्रद्धांजलि देने का अवसर नहीं है। यह उस चेतना को याद करने का दिन है, जिसने पहाड़ के जंगल, नदी, जमीन, संस्कृति, रोजगार और आम आदमी के सवालों को कविता का विषय बनाया।
आज जब उत्तराखंड विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन, पलायन, बेरोजगारी, प्राकृतिक आपदाओं और सांस्कृतिक पहचान जैसे सवालों से जूझ रहा है, तब गिर्दा के गीत हमें फिर वही सवाल पूछने के लिए प्रेरित करते हैं—
विकास किसके लिए?
किस कीमत पर?
और पहाड़ के भविष्य का फैसला कौन करेगा?
शायद यही गिर्दा की सबसे बड़ी विरासत है—उन्होंने हमें केवल गीत नहीं दिए, बल्कि सवाल पूछने की हिम्मत भी दी।
शरीर से गिर्दा भले ही 22 अगस्त 2010 को विदा हो गए, लेकिन उत्तराखंड के पहाड़ों में जब तक जनगीत गूंजते रहेंगे, जब तक जंगल और नदियों के लिए आवाज उठती रहेगी और जब तक कोई युवा अन्याय के खिलाफ खड़ा होगा—गिर्दा की आवाज जीवित रहेगी।
जनकवि, लोकसंस्कृति के प्रहरी और जनसंघर्षों की अमर आवाज गिरीश चंद्र तिवाड़ी ‘गिर्दा’ को उनकी पुण्यतिथि पर शत-शत नमन। 🙏