
काम्यकेश्वर तीर्थ पर महा सप्तमी पर्व रविवारीय शुक्ल सप्तमी पर लगेगा मेला
18 अक्टूबर को आश्विन मास की शुक्ल सप्तमी पर पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र का संयोग
मंदिर में हवन और भंडारे का होगा आयोजन, ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी डालेंगे पूर्णाहुति
कुरुक्षेत्र, 16 अक्टूबर। काम्यकेश्वर तीर्थ कमोदा में आश्विन मास की महा सप्तमी के पावन अवसर पर रविवारीय शुक्ल सप्तमी मेले का आयोजन होगा। ग्रामीणों द्वारा मेले की तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। तीर्थ के घाटों की साफ-सफाई के साथ मंदिर की रंगाई-पुताई का कार्य पूरा हो चुका है, वहीं मंदिर को रंगी-बिरंगी लाइटों से सजाया गया है। 18 अक्टूबर रविवार को हवन के साथ मेले और भंडारे का शुभारंभ होगा। ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी जी द्वारा हवन में पूर्णाहुति डाली जाएगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महा सप्तमी पर तीर्थ स्नान, दान और पूजा-अर्चना करने से दीर्घायु एवं आरोग्य की प्राप्ति होती है और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
मान्यता है कि नवरात्र के पावन अवसर पर पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में मां कालरात्रि की पूजा का विधान बताया गया है, जिसे महा सप्तमी को पुत्र सप्तमी भी कहा जाता है। इस दिन व्रत रखने से संतान सुख की प्राप्ति होती है। श्रद्धालु इस अवसर पर भगवान शिव और मां दुर्गा की आराधना कर परिवार की सुख-समृद्धि एवं कल्याण की कामना करते हैं।
काम्यकेश्वर तीर्थ केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि यह भारत की सनातन परंपरा, सूर्य उपासना और महाभारतकालीन गौरव का अद्भुत संगम है। आश्विन मास की रविवारीय शुक्ल सप्तमी पर यहां स्नान, सूर्य आराधना और मेले में सहभागिता मानव जीवन को आध्यात्मिक ऊर्जा, पुण्य और शांति प्रदान करती है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार काम्यकेश्वर तीर्थ में स्नान करने से उतना ही पुण्य प्राप्त होता है जितना हरिद्वार की हर की पौड़ी में स्नान करने से मिलता है। विशेष रूप से माघ माह की रविवारीय शुक्ला सप्तमी को यहां स्नान का अत्यंत महत्व माना गया है। माना जाता है कि इस दिन तीर्थ में स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है और संतान सुख की कामना भी पूर्ण होती है। यही कारण है कि दूर-दूर से श्रद्धालु, साधु-संत और धर्मप्रेमी जन इस दिन यहां पहुंचते हैं।
मेले की भव्य तैयारियां
काम्यकेश्वर तीर्थ पर लगने वाले इस ऐतिहासिक मेले की तैयारियों में जयराम संस्थाओं और तीर्थ के परमाध्यक्ष श्री ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी जी महाराज का विशेष योगदान है। ग्रामीण सुमिंद्र शास्त्री के अनुसार, यह मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति, लोक आस्था और पौराणिक परंपराओं का जीवंत उत्सव है। आज भी पांडवों के वंशजों और श्रद्धालुओं में यह मान्यता प्रचलित है कि जैसे सोमवती अमावस्या और फल्गु तीर्थ का महत्व है, वैसे ही शुक्ल सप्तमी का इंतजार काम्यकेश्वर तीर्थ के लिए किया जाता है।