
खरीफ सीजन शुरू होते ही किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अगर कोई खड़ी होती है, तो वह है समय पर डीएपी खाद की उपलब्धता। हर साल की तरह इस बार भी देश के कई राज्यों में किसान घंटों नहीं बल्कि कई-कई दिनों तक सहकारी समितियों और खाद केंद्रों के चक्कर लगाने को मजबूर हैं। कहीं लंबी कतारें हैं, कहीं स्टॉक खत्म होने की सूचना है, तो कहीं सीमित मात्रा में खाद बांटी जा रही है। सबसे दुखद स्थिति तब बनती है जब किसान अपनी खेती छोड़कर केवल एक बोरी डीएपी के लिए पूरा दिन लाइन में खड़ा रहता है और अंत में खाली हाथ घर लौटता है।
खेती का हर काम समय पर होने से ही अच्छी पैदावार मिलती है। धान, सोयाबीन, मक्का, अरहर, उड़द, मूंगफली, कपास जैसी खरीफ फसलों की बुवाई के समय यदि डीएपी समय पर नहीं मिले तो फसल की शुरुआती बढ़वार प्रभावित होती है। यही कारण है कि किसान मजबूरी में किसी भी कीमत पर डीएपी खरीदने को तैयार हो जाता है। इसी मजबूरी का फायदा कुछ जगहों पर कालाबाजारी करने वाले व्यापारी उठाते हैं।
सरकारी स्तर पर डीएपी की अधिकतम खुदरा कीमत निर्धारित है, लेकिन जमीनी स्तर पर कई किसानों की शिकायत है कि उन्हें निर्धारित मूल्य पर खाद नहीं मिल रही। कहीं अतिरिक्त उत्पाद खरीदने की शर्त रखी जा रही है, कहीं सीमित मात्रा देकर बाकी खाद बाद में देने का आश्वासन दिया जा रहा है और कहीं किसानों को कई बार चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। यह स्थिति केवल किसान की आर्थिक परेशानी नहीं बढ़ाती बल्कि उसकी मानसिक चिंता भी बढ़ा देती है।
आज गांवों में सबसे अधिक चर्चा इस बात की है कि आखिर खाद की पर्याप्त उपलब्धता होने के बावजूद किसानों तक समय पर क्यों नहीं पहुंच पा रही? यदि गोदामों में स्टॉक है तो वितरण व्यवस्था कमजोर क्यों है? यदि स्टॉक कम है तो इसकी योजना पहले से क्यों नहीं बनाई गई? खेती कोई ऐसा काम नहीं है जिसे कुछ सप्ताह आगे बढ़ाया जा सके। बारिश और मौसम किसी का इंतजार नहीं करते।
डीएपी की कमी का सबसे बड़ा नुकसान छोटे और सीमांत किसानों को होता है। बड़े किसान किसी तरह निजी बाजार से महंगी खाद खरीद लेते हैं, लेकिन छोटे किसान के पास इतना अतिरिक्त पैसा नहीं होता। वह सरकारी समिति से ही खाद मिलने की उम्मीद लगाए बैठा रहता है। जब वहां भी खाद नहीं मिलती तो उसकी पूरी खेती प्रभावित हो जाती है।
एक किसान के लिए खेती केवल व्यवसाय नहीं बल्कि पूरे परिवार की आजीविका का आधार है। वह बैंक से ऋण लेता है, बीज खरीदता है, खेत तैयार करता है, मजदूरी देता है और बारिश का इंतजार करता है। ऐसे समय यदि उसे सबसे जरूरी उर्वरक के लिए भी संघर्ष करना पड़े तो यह व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
डीएपी केवल एक खाद नहीं है बल्कि शुरुआती अवस्था में फसल को फास्फोरस उपलब्ध कराने वाला महत्वपूर्ण उर्वरक है। इससे जड़ों का विकास बेहतर होता है, पौधों की शुरुआती बढ़वार तेज होती है और फसल मजबूत बनती है। इसलिए किसान इसकी अनदेखी नहीं कर सकता। यही वजह है कि मांग बढ़ते ही बाजार में इसकी कमी महसूस होने लगती है।
सरकार लगातार कृषि उत्पादन बढ़ाने, किसानों की आय बढ़ाने और आधुनिक खेती को बढ़ावा देने की बात करती है। लेकिन यदि किसान को समय पर आवश्यक खाद ही उपलब्ध नहीं होगी तो इन सभी योजनाओं का लाभ जमीन पर कैसे दिखाई देगा? खेती की शुरुआत ही यदि संकट से होगी तो उत्पादन बढ़ाने का लक्ष्य कैसे पूरा होगा?
यह भी जरूरी है कि खाद वितरण व्यवस्था पूरी तरह पारदर्शी बनाई जाए। प्रत्येक समिति पर प्रतिदिन उपलब्ध स्टॉक की जानकारी सार्वजनिक हो। किसानों को ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से जानकारी मिले कि किस केंद्र पर कितनी खाद उपलब्ध है। इससे अनावश्यक भीड़ और अफवाहों पर भी रोक लगेगी।
जहां भी कालाबाजारी, टैगिंग, अधिक कीमत वसूलने या कृत्रिम कमी पैदा करने जैसी शिकायतें मिलती हैं, वहां तत्काल जांच और कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। कुछ लोगों की गलत हरकतों की वजह से पूरे कृषि तंत्र की छवि खराब होती है और सबसे अधिक नुकसान किसान को उठाना पड़ता है।
इसके साथ ही किसानों को भी संतुलित उर्वरक प्रबंधन अपनाने की आवश्यकता है। यदि मिट्टी परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का उपयोग किया जाए और जहां संभव हो वहां एसएसपी, एनपीके, जैव उर्वरक तथा जैविक खादों का समुचित उपयोग किया जाए तो डीएपी पर अत्यधिक निर्भरता भी कुछ हद तक कम की जा सकती है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि डीएपी की उपलब्धता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी कम हो जाती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर खरीफ सीजन के दौरान उर्वरकों की आपूर्ति पर लगातार निगरानी रखें। जिलेवार स्टॉक की समीक्षा हो, जरूरत के अनुसार अतिरिक्त आवंटन किया जाए और वितरण व्यवस्था को इतना मजबूत बनाया जाए कि किसी किसान को एक बोरी खाद के लिए घंटों लाइन में खड़ा न रहना पड़े।
किसान देश का अन्नदाता है। वह मौसम की मार सहता है, बढ़ती लागत झेलता है, बाजार की अनिश्चितता का सामना करता है और फिर भी पूरे देश का पेट भरता है। ऐसे किसान को यदि समय पर खाद भी उपलब्ध न हो तो यह केवल एक प्रशासनिक कमी नहीं बल्कि कृषि व्यवस्था की गंभीर चुनौती है।
खरीफ सीजन का हर दिन महत्वपूर्ण है। जो खाद आज खेत में जानी चाहिए, वह यदि एक-दो सप्ताह बाद पहुंचेगी तो उसका लाभ भी कम हो जाएगा। इसलिए केवल पर्याप्त स्टॉक होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि समय पर और समान रूप से किसानों तक उसकी उपलब्धता सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है।
उम्मीद है कि संबंधित विभाग इस समस्या को गंभीरता से लेते हुए ऐसी व्यवस्था बनाएंगे जिससे हर किसान को निर्धारित मूल्य पर, बिना किसी अतिरिक्त शर्त के, समय पर डीएपी उपलब्ध हो सके। खेती तभी मजबूत होगी जब किसान को उसकी जरूरत की हर चीज सही समय पर और उचित मूल्य पर मिले।
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