
थाना परिसर से उड़ गई 'सिंघम' की बुलेट: जब रक्षक की ही 'सवारी' नहीं सुरक्षित, तो भक्षक को कौन पकड़ेगा हुजूर?
L.b. Bhakhar #lalbahadurbhakarjournalist lalbahadurbhakharjournlist
खाजूवाला (सीमावर्ती इलाका)।
कहते हैं कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं, लेकिन इन दिनों खाजूवाला थाने में कानून के हाथ शायद अपनी ही बुलेट ढूंढने में छोटे पड़ रहे हैं। मामला बेहद 'गंभीर और मनोरंजक' है। आम जनता तो छोड़िए, अब पुलिस महकमे के अपने ही 'सिंघम' सुरक्षित नहीं हैं, या यूं कहें कि उनकी बुलेट सुरक्षित नहीं है।
दिल्ली पुलिस के एक जवान, जो बड़े चाव से अपनी चमचमाती बुलेट लेकर खाजूवाला थाने आए थे, उन्हें क्या पता था कि जिस पुलिस परिसर में अपराधी पैर रखने से कांपते हैं, वहीं कोई शातिर चोर उनकी बुलेट पर 'किक' मारकर नौ-दो-ग्यारह हो जाएगा।
'खाकी' की नाक के नीचे से 'खटारा' नहीं, बुलेट गायब!
चोरी तो चोरी, ऊपर से सीनाजोरी देखिए। घटना को बीते पूरे 12 दिन (जी हां, पूरे दो हफ्ते होने को आए हैं) हो चुके हैं, लेकिन मजाल है कि थाने की डायरी में एक एफआईआर (FIR) दर्ज हुई हो। शायद पुलिसकर्मी साहब सोच रहे होंगे कि "अपने ही भाई की तो गाड़ी है, ढूंढ लेंगे चाय-पानी पीते-पीते!"
लेकिन पीड़ित पुलिसकर्मी का सब्र अब जवाब दे गया है। उनका कहना है कि चक्कर काट-काटकर उनके जूतों के सोले घिस गए, पर खाजूवाला पुलिस ने 'मामला दर्ज' करने की जहमत नहीं उठाई। अब सवाल यह उठता है कि:
* **सुरक्षा की गारंटी किसकी?** जिस थाने पर पूरे इलाके की कानून-व्यवस्था का जिम्मा है, अगर वहीं से गाड़ियां गायब होने लगेंगी, तो आम आदमी अपनी फरियाद लेकर कहां जाएगा?
* **सीसीटीवी क्या सिर्फ शोपीस हैं?** सीमावर्ती इलाका होने के नाते जहां परिंदे को भी पर मारने के लिए इजाजत लेनी पड़े, वहां कोई बुलेट स्टार्ट करके आराम से निकल गया और पुलिस को भनक तक नहीं लगी।
12 दिन बाद भी 'नो एफआईआर', वाह री कानून व्यवस्था!
आम आदमी जब थाने जाता है, तो पुलिस कहती है- *"जांच कर रहे हैं, मिल जाएगी।"* लेकिन यहां तो महकमे का ही बंदा पीड़ित है, फिर भी खाजूवाला पुलिस की 'कार्यशैली' कछुए की रफ्तार को भी मात दे रही है।
**व्यंग्य बाण:** शायद चोर भी बहुत स्वाभिमानी था। उसने सोचा होगा कि आम जनता की बाइक चुराकर क्या पाप कमाना, इस बार सीधे 'सिस्टम' की ही सवारी उड़ाते हैं, कम से कम पुलिस को अपनी सुरक्षा व्यवस्था की 'पोल' तो दिखाई देगी!
अब देखना यह है कि पीड़ित पुलिसकर्मी की बुलेट वापस आती है या फिर 12 दिन की यह 'धीमी जांच' रिकॉर्ड बुक में एक और अनसुलझा किस्सा बनकर दर्ज हो जाती है। हुजूर, कम से कम एफआईआर तो दर्ज कर लीजिए, ताकि चोर को भी लगे कि उसने किसी 'कानूनी' चीज पर हाथ साफ किया है!