
यूसीसी पर महिलाओं की दो टूक: लिव-इन में साथ रहेंगे तो पंजीयन भी जरूरी!
लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर यूसीसी समिति के सामने महिलाओं ने उठाया बड़ा सवाल, कहा- रिश्ते से जन्मे बच्चों के अधिकार भी हों सुरक्षित
रायपुर। आज के दौर में जब युवाओं के बीच लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर चर्चा और स्वीकार्यता बढ़ रही है, ऐसे समय में इस रिश्ते को लेकर कानून क्या कहता है और इसमें महिला तथा बच्चों के अधिकार कैसे सुरक्षित होंगे—यह सवाल अब समान नागरिक संहिता (यूसीसी) की चर्चा के केंद्र में पहुंच गया है।
छत्तीसगढ़ में यूसीसी को लेकर हुई एक महत्वपूर्ण बैठक में महिलाओं ने इसी मुद्दे को प्रमुखता से उठाते हुए लिव-इन रिलेशनशिप के पंजीयन को अनिवार्य करने की मांग रखी। महिलाओं का कहना था कि यदि दो वयस्क साथ रहने का निर्णय लेते हैं तो उनके रिश्ते की कानूनी स्थिति भी स्पष्ट होनी चाहिए, ताकि भविष्य में किसी विवाद की स्थिति में महिला के अधिकार सुरक्षित रह सकें।
लिव-इन से बच्चा हुआ तो अधिकार किसके?
महिलाओं ने यूसीसी समिति के सामने एक और महत्वपूर्ण सवाल रखा—लिव-इन रिलेशनशिप से जन्म लेने वाले बच्चों का क्या होगा?
बैठक में ऐसे बच्चों को पालन-पोषण और उत्तराधिकार का पूरा अधिकार देने तथा उनकी जैविक पहचान सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया। महिलाओं का कहना था कि माता-पिता के रिश्ते की प्रकृति का असर बच्चे के अधिकारों पर नहीं पड़ना चाहिए।
सिर्फ साथ रहना नहीं, कानूनी सुरक्षा भी जरूरी
अधिवक्ता सुचित्रा वर्धन ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर कानूनी स्पष्टता की जरूरत बताई। वहीं महिलाओं ने इस बात पर भी जोर दिया कि कानून ऐसा हो, जिससे रिश्ते में किसी महिला के साथ शोषण होने पर उसे प्रभावी कानूनी संरक्षण मिल सके।
संपत्ति और भरण-पोषण में भी बराबरी की मांग
बैठक में महिलाओं ने लिव-इन के साथ-साथ पैतृक संपत्ति में महिलाओं को बराबरी का अधिकार, भरण-पोषण के लिए समान नियम और आपसी सहमति से तलाक की प्रक्रिया को सरल बनाने की मांग भी रखी।
शताब्दी पाण्डेय ने कहा कि छत्तीसगढ़ जनजातीय बहुल प्रदेश है, इसलिए यूसीसी बनाते समय आदिवासी समाज की परंपराओं, रीति-रिवाजों और संस्कृति को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। पंचायत स्तर पर कानूनी सलाह के लिए विशेष डेस्क बनाने का सुझाव भी दिया गया।
बैठक में यूसीसी समिति के सदस्य सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी एम.के. राऊत और वरिष्ठ अधिवक्ता मोहन पवार ने महिलाओं के सुझावों को सुना और उन पर विचार करने का आश्वासन दिया।
अब बड़ा सवाल यही है—क्या बदलते रिश्तों के दौर में लिव-इन रिलेशनशिप को भी स्पष्ट कानूनी ढांचे में लाया जाना चाहिए?
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