
खानपुर से हरिद्वार ग्रामीण तक — क्या हो रही है दबाव की राजनीति?
उत्तराखंड की 2027 विधानसभा चुनाव की राजनीति अभी औपचारिक चुनावी घोषणा से काफी दूर है, लेकिन हरिद्वार जिले में सियासी हलचल जरूर तेज दिखाई देने लगी है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की ओर से हरिद्वार से विधानसभा चुनाव लड़ने की इच्छा जताए जाने और खानपुर में उनकी सक्रियता की खबरों ने राजनीतिक चर्चाओं को नया आधार दिया है। इसी बीच खानपुर विधायक उमेश कुमार की पत्नी सोनिया शर्मा के हरिद्वार ग्रामीण से चुनाव लड़ने की संभावित चर्चा सामने आना इस पूरे घटनाक्रम को और दिलचस्प बना रहा है। हालांकि, सोनिया शर्मा की उम्मीदवारी को लेकर फिलहाल कोई आधिकारिक घोषणा सामने नहीं आई है।
हरीश रावत की राजनीति: लंबा अनुभव, लेकिन बदलते चुनावी ठिकाने
हरीश रावत उत्तराखंड की राजनीति के उन नेताओं में हैं जिनका राजनीतिक सफर राज्य की राजनीति से कहीं आगे राष्ट्रीय राजनीति तक फैला हुआ है। उन्होंने 1980 में लोकसभा चुनाव के जरिए सक्रिय चुनावी राजनीति में प्रवेश किया और अल्मोड़ा से 1980, 1984 और 1989 में लोकसभा चुनाव जीते। इसके बाद कई चुनावी हार के बावजूद कांग्रेस ने उन्हें 2002 में राज्यसभा भेजा। 2009 में उन्होंने हरिद्वार लोकसभा सीट से चुनाव जीता और केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार में मंत्री भी रहे। 2014 में वह उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने। 2017 में उन्होंने हरिद्वार ग्रामीण और किच्छा दोनों सीटों से विधानसभा चुनाव लड़ा, लेकिन दोनों जगह हार गए। हरिद्वार ग्रामीण में उन्हें भाजपा के यतीश्वरानंद ने 12,278 मतों से हराया। 2019 में नैनीताल-ऊधम सिंह नगर लोकसभा सीट और 2022 में लालकुआं विधानसभा सीट से भी उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
यानी हरीश रावत की राजनीति को केवल चुनावी जीत-हार के आंकड़ों से समझना आसान नहीं है। उनका प्रभाव, संगठनात्मक अनुभव और राज्य की राजनीति में लंबी भूमिका एक अलग पक्ष है, जबकि हाल के चुनावों में उनकी व्यक्तिगत चुनावी सफलता दूसरा पक्ष। यही विरोधाभास 2027 की संभावित राजनीति को महत्वपूर्ण बनाता है।
खानपुर क्यों हो सकता है महत्वपूर्ण?
खानपुर में 2022 का चुनाव सामान्य द्विध्रुवीय मुकाबला नहीं था। निर्दलीय उम्मीदवार उमेश कुमार ने 38,767 वोट हासिल कर जीत दर्ज की और उनका वोट शेयर करीब 34.34 प्रतिशत रहा। बसपा के रविंद्र सिंह 31,915 वोट के साथ दूसरे और भाजपा की देवयानी सिंह 30,834 वोट के साथ तीसरे स्थान पर रहीं। कांग्रेस उम्मीदवार को 6,289 वोट मिले। विधायक उमेश कुमार की राजनीति का आधार भी पारंपरिक पार्टी राजनीति से कुछ अलग रहा है। पत्रकारिता और मीडिया से पहचान बनाने वाले उमेश कुमार 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत से जुड़े चर्चित स्टिंग ऑपरेशन के बाद राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आए। 2022 में उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर खानपुर से चुनाव जीतकर अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान स्थापित की।
इस पृष्ठभूमि में यदि हरीश रावत वास्तव में खानपुर से चुनाव मैदान में उतरते हैं, तो मुकाबला केवल दो उम्मीदवारों का चुनावी मुकाबला नहीं रहेगा। इसमें दो अलग राजनीतिक यात्राओं का टकराव भी दिखाई देगा—एक तरफ दशकों का कांग्रेस और राष्ट्रीय राजनीति का अनुभव, दूसरी तरफ मीडिया से निकलकर निर्दलीय राजनीति के जरिए विधानसभा तक पहुंचा नेतृत्व।
फिर हरिद्वार ग्रामीण में सोनिया शर्मा की चर्चा क्यों है महत्वपूर्ण?
हरिद्वार ग्रामीण सीट का हरीश रावत के राजनीतिक इतिहास से सीधा संबंध रहा है। 2017 में इसी सीट से हरीश रावत चुनाव हार चुके हैं। इसके बाद 2022 में उनकी बेटी अनुपमा रावत ने कांग्रेस के टिकट पर इसी सीट से चुनाव जीतकर वापसी की। 2022 में अनुपमा रावत ने भाजपा के यतीश्वरानंद को 4,472 मतों से हराया। इसलिए यदि भविष्य में सोनिया शर्मा की ओर से हरिद्वार ग्रामीण से चुनाव लड़ने की औपचारिक घोषणा होती है, तो राजनीतिक रूप से उसका महत्व केवल एक नई उम्मीदवारी तक सीमित नहीं रहेगा। यह उस सीट पर मौजूदा राजनीतिक समीकरण को प्रभावित करने वाला घटनाक्रम होगा, क्योंकि यहां एक तरफ वर्तमान विधायक अनुपमा रावत हैं और दूसरी तरफ संभावित रूप से उमेश कुमार परिवार का चेहरा मैदान में होगा।
लेकिन यहां एक सावधानी जरूरी है—सिर्फ चर्चा के आधार पर यह कहना कि सोनिया शर्मा निश्चित रूप से चुनाव लड़ेंगी या यह कदम किसी विशेष राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है, अभी जल्दबाजी होगी।
क्या यह दबाव की राजनीति है?
राजनीति में एक साथ दो सीटों पर होने वाली चर्चाओं को सीधे दबाव की राजनीति कहना भी पर्याप्त तथ्य के बिना उचित नहीं होगा। इसके कई संभावित अर्थ हो सकते हैं।
पहला, यह सामान्य राजनीतिक प्रतिक्रिया हो सकती है। दूसरा, दोनों पक्ष अपने-अपने राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र को विस्तार देने की कोशिश कर सकते हैं। तीसरा, यह केवल संभावित उम्मीदवारों के नामों को लेकर चल रही शुरुआती चर्चाएं भी हो सकती हैं।
यह भी ध्यान रखना होगा कि 2027 के टिकटों पर अंतिम निर्णय संबंधित राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों की औपचारिक घोषणाओं से ही स्पष्ट होगा। फिलहाल उपलब्ध तथ्यों से इतना जरूर कहा जा सकता है कि हरीश रावत की खानपुर में संभावित सक्रियता और सोनिया शर्मा के हरिद्वार ग्रामीण से चुनाव लड़ने की चर्चा ने 2027 के लिए एक नया राजनीतिक सवाल खड़ा कर दिया है। क्या यह सिर्फ राजनीतिक अटकल है, या आने वाले महीनों में वास्तव में कोई नया सियासी समीकरण आकार लेगा—इसका जवाब उम्मीदवारों और दलों की आधिकारिक घोषणाओं के बाद ही स्पष्ट होगा।