
'विश्व गुरु' विकसित भारत की हुंकार के बीच सिसकता उत्तराखंड पहाड़: पीठ पर लादकर नापी 5 किलोमीटर की चढ़ाई, तब नसीब हुआ अस्पताल
एक तरफ देश को 'विश्व गुरु' एव विकसित भारत बनाने की हुंकार भरी जा रही है, चमचमाती डिजिटल दुनिया और विकास के बड़े-बड़े दावों वाले पोस्टरों से अखबार और सड़कें पटी पड़ी हैं।
वही उत्तराखंड के विकास की वाह-वाही करते हुए बड़े-बड़े मंचों से भाषण दिए जाते हैं। लेकिन इन सब दावों और पोस्टरों की चमक के पीछे 'देवभूमि' के पहाड़ों का एक ऐसा स्याह और दर्दनाक चेहरा भी है, जिसे देखकर किसी भी संवेदनशील इंसान की रूह कांप जाए।
यह दर्दनाक तस्वीर उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के कपकोट तहसील के बच्चीगांव की है। जहाँ एक मजबूर पिता को तंत्र की नाकामी का बोझ अपनी पीठ पर उठाकर पहाड़ों की उबड़-खाबड़ चढ़ाई नापनी पड़ी।
बच्चीगांव के रहने वाले प्रेम राम का 14 वर्षीय बेटा करन तेज बुखार में तड़प रहा था। तीन दिन तक जब उसकी तबीयत में कोई सुधार नहीं हुआ और हालत गंभीर होने लगी, तो गांव में कोई अस्पताल या डॉक्टर न होने के कारण ग्रामीणों ने उसे जिला अस्पताल ले जाने की सलाह दी। लेकिन विडंबना देखिए, गांव से मुख्य सड़क (हरसिला-कपकोट) की दूरी करीब 5 किलोमीटर है, जहाँ न तो कोई पक्की सड़क है और न ही एम्बुलेंस या गाड़ी पहुंचने का कोई जरिया। रास्ता सिर्फ पत्थरों, उबड़-खाबड़ पगडंडियों और जानलेवा चढ़ाई से भरा है।
जब सिस्टम ने हाथ खड़े कर दिए, तो मजबूर और बेबस पिता ने हिम्मत नहीं हारी। प्रेम राम ने अपने बीमार और तेज बुखार में तपते बेटे को अपनी पीठ पर बांधा और पैदल ही उस पथरीली चढ़ाई पर निकल पड़े। बीच-बीच में कुछ रहमदिल ग्रामीणों ने सहारा जरूर दिया, लेकिन मुख्य सड़क तक पहुंचने के लिए उस पिता को अपने कलेजे के टुकड़े को पीठ पर लादकर 5 किलोमीटर का सफर पैदल ही तय करना पड़ा।
सड़क तक पहुंचने के बाद वाहन के जरिए करीब 24 किलोमीटर दूर जिला अस्पताल बागेश्वर में करन को भर्ती कराया गया। इलाज के बाद बच्चा ठीक तो हुआ, लेकिन उसकी हालत इतनी कमजोर थी कि वह अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सकता था। विडंबना की पराकाष्ठा देखिए कि मंगलवार को वापसी के दौरान भी उस लाचार पिता को अपने बेटे को दोबारा पीठ पर लादकर ही उस दुर्गम पहाड़ी रास्ते से घर वापस लाना पड़ा।
यह किसी एक परिवार की कहानी नहीं है। बच्चीगांव के ग्रामीण सालों से नेताओं और प्रशासन के सामने सड़क निर्माण की गुहार लगा रहे हैं। जनप्रतिनिधियों के चक्कर काट-काटकर ग्रामीणों की चप्पलें घिस गईं, लेकिन आश्वासन के सिवाय कुछ हाथ नहीं लगा। आज भी यहाँ गर्भवती महिलाएं और बुजुर्ग सबसे ज्यादा भुगत रहे हैं। आपातकालीन स्थिति में मरीज को अस्पताल पहुंचाना सीधे तौर पर मौत से जंग लड़ने जैसा है।
चमकते पोस्टरों में उत्तराखंड का जो विकास दिखाया जाता है, क्या वह केवल फाइलों और विज्ञापनों तक ही सीमित है? डिजिटल इंडिया और 'विश्व गुरु' बनने की राह पर अग्रसर देश में अगर आज भी एक पिता को अपने बीमार बच्चे को इलाज के लिए पीठ पर लादकर मीलों पैदल चलना पड़े, तो समझ जाना चाहिए कि हमारा सिस्टम आईसीयू (ICU) में है।
आखिर कब तक पहाड़ों का पानी और पहाड़ों की जवानी के साथ-साथ यहाँ के मासूमों का स्वास्थ्य भी यूं ही लाचारी के आंसुओं में बहता रहेगा? प्रशासन और सरकार को इन विज्ञापनों की दुनिया से बाहर आकर धरातल के इस कड़वे सच को देखना ही होगा।
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