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मालवीय नगर अग्निकांड: 21 मौतों का जिम्मेदार कौन? शेफ केशव नेगी की गिरफ्तारी पर उठे बड़े सवाल

नई दिल्ली। दक्षिण दिल्ली के मालवीय नगर स्थित फ्लॉरिश स्टे होटल में हुए भीषण अग्निकांड ने 21 लोगों की जान ले ली, जबकि 37 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। मृतकों में कई विदेशी नागरिक भी शामिल हैं, जो इलाज के लिए भारत आए थे। लेकिन हादसे के बाद जांच और कार्रवाई को लेकर अब कई सवाल खड़े हो रहे हैं।

जांच में सामने आया है कि आग ग्राउंड फ्लोर पर चल रहे रेस्टोरेंट के किचन से शुरू हुई और देखते ही देखते पूरी इमारत में फैल गई। बताया जा रहा है कि इमारत में केवल एक संकरा एंट्री-एग्जिट रास्ता था, जिसके कारण लोग बाहर नहीं निकल सके। कई लोगों ने जान बचाने के लिए खिड़कियों से छलांग तक लगा दी।

दिल्ली फायर सर्विस के अनुसार इमारत के पास फायर NOC नहीं थी। एमसीडी सूत्रों का दावा है कि जहां केवल 6 कमरों की अनुमति थी, वहां 20 से 25 कमरे बना दिए गए थे। साथ ही जिस रेस्टोरेंट को केवल चाय-नाश्ते की अनुमति थी, वहां पूरा किचन संचालित किया जा रहा था और लाइसेंस की अवधि भी समाप्त हो चुकी थी।

इसी बीच पुलिस ने होटल से जुड़े शेफ केशव नेगी को गिरफ्तार कर लिया है। गिरफ्तारी के बाद सोशल मीडिया और आम लोगों के बीच एक बड़ा सवाल उठ रहा है—

क्या केवल शेफ ही जिम्मेदार है?

केशव नेगी उत्तराखंड से रोजगार की तलाश में दिल्ली आए थे और रसोई में खाना बनाने का काम करते थे। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि—

क्या बिल्डिंग की वैधता जांचना शेफ की जिम्मेदारी थी?

फायर NOC है या नहीं, यह देखने का दायित्व किसका था?

एक ही एंट्री-एग्जिट होने की अनुमति किसने दी?

अवैध निर्माण और अतिरिक्त कमरों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

रिहायशी क्षेत्र में व्यावसायिक गतिविधियां किसकी निगरानी में चल रही थीं?

निरीक्षण और नियमों के पालन की जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारी कहां थे?

देश जानना चाहता है जवाब

21 निर्दोष लोगों की मौत केवल एक हादसा नहीं, बल्कि व्यवस्था पर गंभीर सवाल है। यदि भवन में अवैध निर्माण, फायर सुरक्षा की कमी और नियमों का खुला उल्लंघन हुआ था, तो क्या जांच केवल सबसे कमजोर कड़ी तक सीमित रहेगी या फिर उन सभी जिम्मेदार लोगों तक भी पहुंचेगी जिनके ऊपर कानून लागू कराने और सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी थी?

मालवीय नगर अग्निकांड अब केवल आग की घटना नहीं रह गया है, बल्कि जवाबदेही और न्याय का बड़ा सवाल बन चुका है। पीड़ित परिवारों और देश की जनता यह जानना चाहती है कि आखिर इस त्रासदी का वास्तविक जिम्मेदार कौन है और क्या सभी दोषियों पर समान रूप से कार्रवाई होगी?

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बेतालघाट के दीपक खंडूरी अपनी मधुर वाणी और ज्ञान से देशभर में बिखेर रहे हैं कथा की आभा

बेतालघाट (नैनीताल)।
देवभूमि उत्तराखंड की पावन धरती सदियों से संतों, विद्वानों और आध्यात्मिक विभूतियों की जन्मस्थली रही है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए नैनीताल जिले के बेतालघाट क्षेत्र के आमबाड़ी निवासी दीपक खंडूरी (पुत्र श्री विजय खंडूरी) आज अपनी मधुर वाणी, गहन धार्मिक ज्ञान और प्रभावशाली कथा वाचन शैली के माध्यम से पूरे देश में क्षेत्र का नाम गौरवान्वित कर रहे हैं।

दीपक खंडूरी ने सनातन संस्कृति और धर्मग्रंथों का गहन अध्ययन देश के प्रमुख आध्यात्मिक केंद्रों वृंदावन और काशी में किया है। वेद, पुराण, शास्त्र, संगीत और कथा पर उनकी गहरी पकड़ उनकी प्रस्तुतियों में स्पष्ट दिखाई देती है। यही कारण है कि उनकी कथाएं केवल धार्मिक आयोजन नहीं रह जातीं, बल्कि श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक अनुभूति का माध्यम बन जाती हैं।

अपनी साधना, समर्पण और अथक परिश्रम के बल पर दीपक खंडूरी आज दिल्ली, हरियाणा, उत्तराखंड सहित देश के विभिन्न राज्यों में एक लोकप्रिय और ओजस्वी कथावाचक के रूप में पहचान बना चुके हैं। उनकी सुरीली आवाज, सरल भाषा और भावपूर्ण प्रस्तुति श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देती है।

श्रद्धालुओं का कहना है कि दीपक जी स्वभाव से जितने सरल, विनम्र और ज्ञानी हैं, उनकी कथा उतनी ही हृदयस्पर्शी और दिव्य होती है। व्यासपीठ पर बैठते ही वे ऐसा भक्तिमय वातावरण निर्मित कर देते हैं कि श्रोता पूरी तरह भक्ति रस में डूब जाते हैं।

उनकी बढ़ती लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देशभर में आयोजित होने वाली उनकी कथाओं में हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं। कथा के साथ प्रस्तुत किए जाने वाले भजन और आध्यात्मिक प्रसंग लोगों को भाव-विभोर कर देते हैं तथा घंटों तक श्रद्धालु कथा पंडालों में जुड़े रहते हैं।

दीपक खंडूरी द्वारा किए जा रहे इस पावन कार्य से उनके परिवार के साथ-साथ पूरे बेतालघाट क्षेत्र में गर्व और खुशी का माहौल है। स्थानीय लोगों का मानना है कि उन्होंने अपनी प्रतिभा, ज्ञान और संस्कारों के बल पर न केवल अपने परिवार बल्कि पूरे क्षेत्र का नाम देश भर में  स्थापित किया है।

देवभूमि की इस युवा आध्यात्मिक प्रतिभा को क्षेत्रवासी उज्ज्वल भविष्य और निरंतर सफलता की शुभकामनाएं दे रहे हैं। सभी को विश्वास है कि दीपक खंडूरी आने वाले समय में सनातन संस्कृति और उत्तराखंड की आध्यात्मिक परंपराओं को देश-दुनिया तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

रिपोर्ट  - Betalghat Nainital  

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राहुल गांधी का अल्मोड़ा-पौड़ी दौरा रद्द, धन सिंह रावत का पुराना बयान फिर हुआ वायरल
देहरादून/अल्मोड़ा। नेता प्रतिपक्ष Rahul Gandhi का प्रस्तावित अल्मोड़ा और पौड़ी दौरा खराब मौसम के कारण रद्द होने के बाद उत्तराखंड की राजनीति में नई बहस छिड़ गई है। दौरा रद्द होने के साथ ही प्रदेश के कैबिनेट मंत्री Dhan Singh Rawat का वर्षों पुराना "मौसम नियंत्रित करने वाले ऐप" संबंधी बयान सोशल मीडिया पर फिर से वायरल होने लगा है। लोग इस बयान को लेकर तंज कस रहे हैं और तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं।
सोशल मीडिया पर कुछ लोग मजाकिया अंदाज में सवाल उठा रहे हैं कि कहीं "मौसम बदलने वाले ऐप" ने ही राहुल गांधी का रास्ता तो नहीं रोक दिया। हालांकि ऐसे दावों का कोई आधिकारिक आधार नहीं है और प्रशासन की ओर से कार्यक्रम रद्द होने की वजह खराब मौसम और उड़ान सुरक्षा को बताया गया है।
इस बीच कांग्रेस नेताओं ने भी सवाल उठाए हैं। पूर्व मुख्यमंत्री Harish Rawat ने कहा कि यदि अन्य हेलीकॉप्टर उड़ान भर रहे थे तो यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि राहुल गांधी का हेलीकॉप्टर क्यों नहीं उड़ सका। उन्होंने पूरे मामले में पारदर्शिता की आवश्यकता बताई है।
राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या वास्तव में मौसम इतना खराब था कि कार्यक्रम रद्द करना पड़ा, या फिर इसके पीछे कोई अन्य कारण था। हालांकि अभी तक किसी भी सरकारी एजेंसी या प्रशासनिक अधिकारी ने मौसम के अलावा किसी अन्य वजह की पुष्टि नहीं की है।
राहुल गांधी के दौरे को लेकर कांग्रेस ने अल्मोड़ा और पौड़ी में व्यापक तैयारियां की थीं और बड़ी संख्या में लोगों के पहुंचने का दावा किया जा रहा था। दौरा रद्द होने के बाद समर्थकों में निराशा जरूर देखी गई, लेकिन कांग्रेस नेताओं का कहना है कि कार्यक्रम को जल्द ही नए सिरे से आयोजित किया जाएगा।
अल्मोड़ा की भीड़ ने बढ़ाई सियासी हलचल, क्या उत्तराखंड में बदलाव की आहट?

अल्मोड़ा, 4 जून। उत्तराखंड के अल्मोड़ा में आज नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का एक दिवसीय कार्यक्रम प्रस्तावित था, लेकिन खराब मौसम के कारण उनका हेलीकॉप्टर अल्मोड़ा नहीं पहुंच सका। मौसम की बाधा के चलते कार्यक्रम में उनकी शारीरिक मौजूदगी नहीं हो पाई, हालांकि उन्होंने फोन के माध्यम से सभा को संबोधित किया।

राहुल गांधी भले ही अल्मोड़ा नहीं पहुंच पाए, लेकिन उन्हें सुनने और देखने के लिए उमड़ी भारी भीड़ ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। कार्यक्रम स्थल पर हजारों की संख्या में पहुंचे लोगों को देखकर हर कोई हैरान नजर आया।

अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह भीड़ केवल राहुल गांधी के प्रति लोगों की उत्सुकता का परिणाम थी, या फिर उत्तराखंड की जनता राजनीतिक बदलाव का मन बना चुकी है? जिस तरह से लोगों ने खराब मौसम के बावजूद कार्यक्रम में पहुंचकर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई, उसने राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इतनी बड़ी संख्या में लोगों का जुटना आगामी चुनावी समीकरणों के लिए महत्वपूर्ण संकेत हो सकता है। वहीं सत्ता पक्ष के लिए भी यह भीड़ चिंता और आत्ममंथन का विषय बन सकती है।

हालांकि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना अभी जल्दबाजी होगी, लेकिन अल्मोड़ा में दिखाई दी यह भीड़ निश्चित रूप से उत्तराखंड की राजनीति में एक नए संदेश के रूप में देखी जा रही है। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि यह भीड़ केवल एक नेता को देखने के लिए थी या फिर राज्य में किसी बड़े राजनीतिक बदलाव की दस्तक है।

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खराब मौसम के चलते अल्मोड़ा नहीं पहुंच पाए राहुल गांधी, फोन पर जनसभा को किया संबोधित

अल्मोड़ा। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता @Rahul Gandhi गुरुवार को खराब मौसम के कारण अल्मोड़ा नहीं पहुंच सके। निर्धारित कार्यक्रम के तहत उन्हें अल्मोड़ा में आयोजित जनसभा में शामिल होना था, लेकिन खराब विजिबिलिटी और मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों के चलते उनका हेलीकॉप्टर अल्मोड़ा नहीं पहुंच पाया और पंतनगर एयरपोर्ट पर उतरना पड़ा।

राहुल गांधी के कार्यक्रम में बड़ी संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ता और समर्थक पहुंचे थे। उनके नहीं पहुंच पाने से कार्यकर्ताओं में मायूसी जरूर रही, लेकिन कार्यक्रम को रद्द नहीं किया गया। कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी सैलजा रानी ने मंच से राहुल गांधी से फोन पर संपर्क कराया, जिसके बाद राहुल गांधी ने फोन के माध्यम से जनसभा को संबोधित किया।

अपने संबोधन में राहुल गांधी ने उपस्थित लोगों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि वह व्यक्तिगत रूप से सभा में शामिल होना चाहते थे, लेकिन खराब मौसम के कारण यात्रा संभव नहीं हो सकी। उन्होंने जनता और कार्यकर्ताओं से जुड़े रहने तथा क्षेत्र के मुद्दों के लिए संघर्ष जारी रखने की बात कही।

जनसभा के दौरान सैलजा रानी ने कहा कि मौसम की वजह से राहुल गांधी अल्मोड़ा नहीं पहुंच पाए, लेकिन उनका संदेश और विचार जनता तक पहुंचाना जरूरी था। इसी उद्देश्य से उन्हें फोन के माध्यम से जनसभा से जोड़ा गया।

खराब मौसम के बावजूद जनसभा में कार्यकर्ताओं और समर्थकों का उत्साह बना रहा। कांग्रेस नेताओं ने इसे जनता के समर्थन का प्रमाण बताते हुए कहा कि राहुल गांधी जल्द ही उत्तराखंड का दौरा कर कार्यकर्ताओं और जनता से सीधे संवाद करेंगे।

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उत्तराखंड में दिल दहला देने वाली घटना - एक ड्राइवर जिसने बचा ली 34 जिंदगी लेकिन खुद हो गया शहीद ।। क्या उत्तराखंड  सरकार सम्मान देगी ऐसे  दिवंगत वीर ड्राइवर के परिवार को ?? देखिए पूरी खबर शेयर भी करे -

Pushkar Singh Dhami <nis:link nis:type=tag nis:id=lohaghat nis:value=lohaghat nis:enabled=true nis:link/> <nis:link nis:type=tag nis:id=tankpur nis:value=tankpur nis:enabled=true nis:link/> <nis:link nis:type=tag nis:id=pithoragarh nis:value=pithoragarh nis:enabled=true nis:link/> <nis:link nis:type=tag nis:id=uttarakhand nis:value=uttarakhand nis:enabled=true nis:link/> <nis:link nis:type=tag nis:id=viral nis:value=viral nis:enabled=true nis:link/> <nis:link nis:type=tag nis:id=pahad nis:value=pahad nis:enabled=true nis:link/> <nis:link nis:type=tag nis:id=news nis:value=news nis:enabled=true nis:link/> <nis:link nis:type=tag nis:id=kumaon nis:value=kumaon nis:enabled=true nis:link/> <nis:link nis:type=tag nis:id=tranding nis:value=tranding nis:enabled=true nis:link/>
'विश्व गुरु'  विकसित भारत की हुंकार के बीच सिसकता उत्तराखंड पहाड़: पीठ पर लादकर नापी 5 किलोमीटर की चढ़ाई, तब नसीब हुआ अस्पताल

एक तरफ देश को 'विश्व गुरु' एव विकसित भारत  बनाने की हुंकार भरी जा रही है, चमचमाती डिजिटल दुनिया और विकास के बड़े-बड़े दावों वाले पोस्टरों से अखबार और सड़कें पटी पड़ी हैं।
 वही उत्तराखंड के विकास की वाह-वाही करते हुए बड़े-बड़े मंचों से भाषण दिए जाते हैं। लेकिन इन सब दावों और पोस्टरों की चमक के पीछे 'देवभूमि' के पहाड़ों का एक ऐसा स्याह और दर्दनाक चेहरा भी है, जिसे देखकर किसी भी संवेदनशील इंसान की रूह कांप जाए।

यह दर्दनाक तस्वीर उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के कपकोट तहसील के बच्चीगांव की है। जहाँ एक मजबूर पिता को तंत्र की नाकामी का बोझ अपनी पीठ पर उठाकर पहाड़ों की उबड़-खाबड़ चढ़ाई नापनी पड़ी।

बच्चीगांव के रहने वाले प्रेम राम का 14 वर्षीय बेटा करन तेज बुखार में तड़प रहा था। तीन दिन तक जब उसकी तबीयत में कोई सुधार नहीं हुआ और हालत गंभीर होने लगी, तो गांव में कोई अस्पताल या डॉक्टर न होने के कारण ग्रामीणों ने उसे जिला अस्पताल ले जाने की सलाह दी। लेकिन विडंबना देखिए, गांव से मुख्य सड़क (हरसिला-कपकोट) की दूरी करीब 5 किलोमीटर है, जहाँ न तो कोई पक्की सड़क है और न ही एम्बुलेंस या गाड़ी पहुंचने का कोई जरिया। रास्ता सिर्फ पत्थरों, उबड़-खाबड़ पगडंडियों और जानलेवा चढ़ाई से भरा है।
जब सिस्टम ने हाथ खड़े कर दिए, तो मजबूर और बेबस पिता ने हिम्मत नहीं हारी। प्रेम राम ने अपने बीमार और तेज बुखार में तपते बेटे को अपनी पीठ पर बांधा और पैदल ही उस पथरीली चढ़ाई पर निकल पड़े। बीच-बीच में कुछ रहमदिल ग्रामीणों ने सहारा जरूर दिया, लेकिन मुख्य सड़क तक पहुंचने के लिए उस पिता को अपने कलेजे के टुकड़े को पीठ पर लादकर 5 किलोमीटर का सफर पैदल ही तय करना पड़ा।
सड़क तक पहुंचने के बाद वाहन के जरिए करीब 24 किलोमीटर दूर जिला अस्पताल बागेश्वर में करन को भर्ती कराया गया। इलाज के बाद बच्चा ठीक तो हुआ, लेकिन उसकी हालत इतनी कमजोर थी कि वह अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सकता था। विडंबना की पराकाष्ठा देखिए कि मंगलवार को वापसी के दौरान भी उस लाचार पिता को अपने बेटे को दोबारा पीठ पर लादकर ही उस दुर्गम पहाड़ी रास्ते से घर वापस लाना पड़ा।

यह किसी एक परिवार की कहानी नहीं है। बच्चीगांव के ग्रामीण सालों से नेताओं और प्रशासन के सामने सड़क निर्माण की गुहार लगा रहे हैं। जनप्रतिनिधियों के चक्कर काट-काटकर ग्रामीणों की चप्पलें घिस गईं, लेकिन आश्वासन के सिवाय कुछ हाथ नहीं लगा। आज भी यहाँ गर्भवती महिलाएं और बुजुर्ग सबसे ज्यादा भुगत रहे हैं। आपातकालीन स्थिति में मरीज को अस्पताल पहुंचाना सीधे तौर पर मौत से जंग लड़ने जैसा है।
चमकते पोस्टरों में उत्तराखंड का जो विकास दिखाया जाता है, क्या वह केवल फाइलों और विज्ञापनों तक ही सीमित है? डिजिटल इंडिया और 'विश्व गुरु' बनने की राह पर अग्रसर देश में अगर आज भी एक पिता को अपने बीमार बच्चे को इलाज के लिए पीठ पर लादकर मीलों पैदल चलना पड़े, तो समझ जाना चाहिए कि हमारा सिस्टम आईसीयू (ICU) में है।

 आखिर कब तक पहाड़ों का पानी और पहाड़ों की जवानी के साथ-साथ यहाँ के मासूमों का स्वास्थ्य भी यूं ही लाचारी के आंसुओं में बहता रहेगा? प्रशासन और सरकार को इन विज्ञापनों की दुनिया से बाहर आकर धरातल के इस कड़वे सच को देखना ही होगा।

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34 यात्रियों की जान बचाकर खुद जिंदगी हार गया चालक, बेनीराम की बहादुरी को सलाम

लोहाघाट। उत्तराखंड के लोहाघाट क्षेत्र में राष्ट्रीय राजमार्ग पर हुए दर्दनाक सड़क हादसे ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया। धारचूला से टनकपुर  जा रही बस बस का बस ब्रेक फेल हो गया इस हादसे में रोडवेज बस चालक बेनीराम ने अपनी जान की परवाह किए बिना 34 यात्रियों की जिंदगी बचाकर अद्वितीय साहस और कर्तव्यनिष्ठा का परिचय दिया।

जानकारी के अनुसार बस के ब्रेक अचानक फेल हो गए थे। बस अनियंत्रित होकर तेज रफ्तार में आगे बढ़ रही थी और किसी भी समय बड़ा हादसा हो सकता था। ऐसे कठिन क्षण में चालक बेनीराम ने घबराने के बजाय सूझबूझ का परिचय देते हुए बस को सड़क किनारे दीवार से टकरा दिया, जिससे बस में सवार 34 यात्रियों की जान बच गई।

लेकिन यात्रियों को सुरक्षित बचाने की इस जंग में बेनीराम खुद जिंदगी की लड़ाई हार गए। क्योंकि जब उनके द्वारा दीवार पर बस को टकराया तो अचानक ड्राइवर की ओर वाला दरबाजा खुल गया जिस से झटक कर वो नीचे गिर बस का टायर उनके ऊपर चढ़ गया जिस से उनकी जान चली गयी ।।  उनका यह सर्वोच्च बलिदान हमेशा याद रखा जाएगा। उन्होंने अंतिम सांस तक अपने कर्तव्य को निभाया और यह साबित कर दिया कि सच्चा कर्मवीर वही होता है जो दूसरों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की भी परवाह नहीं करता।

आज पूरा उत्तराखंड इस वीर चालक को नम आंखों से श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है। बेनीराम का साहस, समर्पण और कर्तव्यनिष्ठा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनी रहेगी।

स्वर्गीय बेनीराम जी को भावभीनी श्रद्धांजलि।
ईश्वर दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें तथा शोक संतप्त परिवार को इस अपार दुःख को सहन करने की शक्ति प्रदान करें।

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दो भाई, एक सपना: नीरज और हरीश ने साथ-साथ हासिल की भारतीय सेना में सफलता

बागेश्वर: कहते हैं कि मेहनत, लगन और आपसी सहयोग से हर मंजिल हासिल की जा सकती है। इसकी मिसाल पेश की है जनपद बागेश्वर की शामा उप तहसील के लीती गांव निवासी दो सगे भाइयों नीरज कोरंगा और हरीश कोरंगा ने।

दोनों भाइयों की कहानी बचपन से ही प्रेरणादायक रही है। कक्षा 1 से लेकर 12वीं तक दोनों ने साथ पढ़ाई की। पढ़ाई में दोनों इतने प्रतिभाशाली थे कि अक्सर एक भाई प्रथम स्थान प्राप्त करता तो दूसरा द्वितीय स्थान पर रहता। दोनों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा हमेशा बनी रही, जिसने उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।

12वीं उत्तीर्ण करने के बाद दोनों भाइयों ने एनसीसी का 'सी' सर्टिफिकेट प्राप्त करने के लिए कॉलेज में प्रवेश लिया और साथ ही भारतीय सेना में भर्ती की तैयारी भी शुरू कर दी। कठिन परिश्रम और दृढ़ संकल्प का परिणाम यह रहा कि दोनों भाई पहली ही कोशिश में भारतीय सेना के लिए चयनित हो गए।

रानीखेत सोमनाथ मैदान में देश सेवा की शपथ लेने के बाद अब दोनों भाई भारतीय सेना का हिस्सा बनकर राष्ट्र की सेवा कर रहे हैं। उनकी सफलता न केवल उनके परिवार बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए गर्व का विषय है।

नीरज और हरीश के पिता चंदन सिंह कोरंगा टैक्सी चालक हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अपने बेटों को बेहतर शिक्षा और आगे बढ़ने के लिए हमेशा प्रेरित किया। आज दोनों बेटों की उपलब्धि ने परिवार का नाम रोशन कर दिया है।

गांव और क्षेत्र के लोगों ने दोनों भाइयों की इस उपलब्धि पर खुशी व्यक्त करते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की है।

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​बेतालघाट (...
नैनीताल: PMGSY सड़क निर्माण में ₹1.5 करोड़ के 'बंदरबांट' का आरोप, घटिया सामग्री देख भड़के ग्रामीण और जिला पंचायत सदस्य य...
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