
⬇️कुमौड़ की हिलजात्रा: लखियाभूत से जुड़ी वीर महर भाइयों की कहानी⬇️
कुमौड़ की प्रसिद्ध हिलजात्रा केवल एक लोक उत्सव नहीं, बल्कि इतिहास, लोकविश्वास और नेपाल-कुमाऊँ की साझा सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। इस उत्सव के मुख्य पात्र लखियाभूत या लखियादेव माने जाते हैं।
हिलजात्रा की शुरुआत को लेकर चार वीर महर भाइयों की कथा सबसे अधिक प्रचलित है। मान्यता है कि पिथौरागढ़ में एक समय नरभक्षी शेर का आतंक था। राजा ने उसे मारने वाले को मनचाहा पुरस्कार देने की घोषणा की। चारों महर भाइयों ने शेर का वध कर दिया।
राजा ने प्रसन्न होकर उन्हें पुरस्कार मांगने को कहा। कुंवर सिंह कुरमौर ने चंडाक से दिखाई देने वाली भूमि मांगी, जिससे कुरमौर से कुमौड़ नाम पड़ने की लोकमान्यता है। अन्य भाइयों के नाम से चेंसर, जाखनी और बिण के नाम जुड़े होने की भी मान्यता है।
एक दूसरी लोककथा हिलजात्रा को नेपाल की इंद्रजात्रा से जोड़ती है। कहा जाता है कि नेपाल यात्रा के दौरान महर भाइयों ने राजा की भैंसे की बलि से जुड़ी कठिन समस्या का समाधान किया। प्रसन्न होकर राजा ने उन्हें उत्सव मनाने और वहां प्रयोग होने वाले मुखौटे अपने क्षेत्र में ले जाने की अनुमति दी।
इसीलिए हिलजात्रा को कुछ लोग पश्चिमी नेपाल के सोराड़ क्षेत्र की सांस्कृतिक देन मानते हैं, तो कुछ इसे मानसरोवर यात्रा से जुड़े यात्रियों के मनोरंजन की परंपरा से जोड़ते हैं।
कुमौड़ की हिलजात्रा आज भी इन लोककथाओं, आस्था और सदियों पुरानी सांस्कृतिक परंपराओं को जीवंत बनाए हुए है।
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