
# धरोहर की ओट में सिसकती नैतिकता: चंदेरी का आबकारी सच
**- व्यवस्था की चौखट पर दम तोड़ते नियम और छले जाते नौनिहाल**
चंदेरी सिर्फ पत्थरों, किलों और साड़ियों का शहर नहीं है; यह एक जीवंत तहज़ीब, एक बेदाग इतिहास और सामाजिक समरसता की साक्षात प्रतिमूर्ति रहा है। किंतु आज इस ऐतिहासिक नगरी की हवाओं में एक अजीब सी कड़वाहट और अश्लीलता घोल दी गई है। नगर के हृदयस्थल पर पसरा शराब का साम्राज्य और उसके इर्द-गिर्द पनपती अराजकता इस बात का जीवंत प्रमाण है कि जब प्रशासनिक तंत्र जनहित से विमुख होकर सत्ता और रसूख के आगे नतमस्तक हो जाता है, तो विनाश की पटकथा कैसे लिखी जाती है।
### नियमों की अर्थी पर सजा 'मधुशाला' का बाज़ार
मध्य प्रदेश आबकारी नीति 1995 और माननीय सर्वोच्च न्यायालय के समय-समय पर आए दिशा-निर्देश कोई बंद कमरों में लिखी गई कविताएं नहीं हैं, जिन्हें सिर्फ पढ़ा जाए। वे कानून हैं। लेकिन चंदेरी की भौगोलिक और प्रशासनिक हकीकत को देखें तो स्पष्ट होता है कि यहाँ इन नियमों की सरेआम अर्थी निकाली जा रही है।
एक शराब की दुकान का नगर के बीचो-बीच और दरगाह जैसी मुकद्दस जगह के पास होना, और दूसरी दुकान का शासकीय प्राथमिक विद्यालय हरकुण्ड की दहलीज से सटकर संचालित होना, प्रशासनिक संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है।
**सोचिए, हम अपने बच्चों को कैसा भविष्य सौंप रहे हैं?** जिस उम्र में बच्चों के हाथों में ज्ञान की वर्णमाला होनी चाहिए, उस उम्र में वे अपनी पाठशाला के ठीक बाहर शराबियों की गालियां, असंसदीय भाषा और मदहोशी का नंगा नाच देखने को मजबूर हैं। क्या यह उन मासूमों के मौलिक और नैतिक अधिकारों का हनन नहीं है?
### समानांतर सत्ता चलाते शराब ठेकेदार और मौन प्रशासन
इस पूरे प्रकरण में जो सबसे वीभत्स पहलू है, वह है शराब माफियाओं के बुलंद हौसले। कागजों पर केवल दो दुकानें स्वीकृत हैं, लेकिन व्यवहार में चंदेरी के गांव-गांव में अवैध कलारियों का एक पूरा संजाल (नेटवर्क) बिछा दिया गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि चंदेरी में आबकारी विभाग का समानांतर शासन चल रहा है, जहाँ नियम ठेकेदार तय करते हैं और अमला सिर्फ तामील करता है।
नगर पालिका परिषद चंदेरी द्वारा इन दुकानों को शहर के बाहर स्थापित करने के लिए बाकायदा 'ठहराव संकल्प' पारित किया जा चुका है। पार्षदों द्वारा ग्वालियर आबकारी आयुक्त को लगातार पत्र लिखे जा रहे हैं। बावजूद इसके, अधिकारियों की यह रहस्यमयी खामोशी कई गंभीर सवाल खड़े करती है:
* क्या प्रशासन जनभावनाओं से ऊपर किसी अदृश्य दबाव में काम कर रहा है?
* या फिर यह पूरी खामोशी किसी 'महीने की सेटिंग' और 'प्रशासनिक साठगांठ' के एवज में खरीदी गई है?
### बिखरते आशियाने और सुलगता जन-आक्रोश
शराब की इन दुकानों ने केवल सड़कों का माहौल खराब नहीं किया है, बल्कि इसने चंदेरी के सैकड़ों घरों के भीतर गृहक्लेश, घरेलू हिंसा और आर्थिक तबाही का ज़हर घोल दिया है। ग्रामीण अंचलों में आए दिन होने वाले वाद-विवाद और अपराधों के मूल में यही अवैध शराब का कारोबार है।
जनता यह सब देख रही है, सह रही है, लेकिन याद रहे कि लोक-लाज और सब्र की एक अंतिम सीमा होती है। जब रक्षक ही भक्षक की भूमिका में मौन सहमति देने लगे, तो फिर जनता को सड़कों पर उतरने से कोई नहीं रोक सकता।
### उपसंहार: जागने का अंतिम अवसर
चंदेरी की अस्मिता, संस्कृति और यहाँ के बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की रक्षा के लिए अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। ग्वालियर संभाग के आबकारी आयुक्त और स्थानीय जिला प्रशासन को तत्काल प्रभाव से इस विषय को संज्ञान में लेना होगा। इन दोनों दुकानों को अविलंब नगर की सीमा से बाहर स्थानांतरित किया जाए और ग्रामीण क्षेत्रों में चल रही अवैध मधुशालाओं पर कानून का हंटर चलाया जाए।
यदि अब भी प्रशासनिक कुंभकर्णी नींद नहीं टूटी, तो यह मान लिया जाएगा कि शासन को जनता की चीखों से ज्यादा शराब के राजस्व और ठेकेदारों के मुनाफे की फिक्र है। किसी बड़े हादसे या उग्र जन-आंदोलन की प्रतीक्षा करने के बजाय, समय रहते जनहित में निर्णय लेना ही प्रशासनिक बुद्धिमत्ता होगी।
Gwalior Commissioner Jansampark Madhya Pradesh Collector Ashok Nagar SDM Chanderi PRO Ashok Nagar @highlight