
मुगलों की बहू की दास्तान: तंगहाली में कटी जिंदगी, पानी में ब्रेड डुबोकर पाले बच्चे; कभी जिस खानदान का था लाल किला, आज वहां भी टिकट लेकर जाती हैं रजिया सुल्ताना
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कभी जिस सल्तनत के इशारे पर हिंदुस्तान की हुकूमत चलती थी और दिल्ली का लाल किला जिनकी शान का गवाह रहा, उसी मुगल खानदान की बहू आज पश्चिम बंगाल के हावड़ा की एक तंग बस्ती में किराए के कमरे में गुमनाम जिंदगी बिताने को मजबूर हैं। अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के पड़पोते मिर्जा बेदार बख्त की बेवा रजिया सुल्ताना बेगम की दास्तान शाही अतीत और मौजूदा मुफलिसी के गहरे फासले को बयां करती है।
महज 12 साल की उम्र में शाही खानदान की बहू बनीं रजिया ने जिंदगी के तमाम उतार-चढ़ाव बेहद करीब से देखे हैं। पति के इंतकाल के बाद दो वक्त की रोटी का इंतजाम करने के लिए उन्होंने कभी जिल्दसाजी की, तो कभी लाख की चूड़ियां बनाईं और चाय की दुकान तक चलाई। उन्होंने अपने बच्चों को पानी में ब्रेड डुबोकर खिलाया, मगर कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया।
आज महज 6 हजार रुपये की मामूली पेंशन के सहारे दिन काट रहीं रजिया को अपने ही पुरखों के बनाए लाल किले में कदम रखने के लिए आम सैलानियों की तरह टिकट खरीदना पड़ता है। जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर खड़ी रजिया की अब सिर्फ इतनी सी तमन्ना है कि हुकूमत उनके परिवार के ऐतिहासिक वजूद को पहचान दे और उन्हें सर छिपाने के लिए एक अदद अपनी छत नसीब हो सके।