
भांडाशाह (भांडासर) जैन मंदिर के निर्माण में पानी की जगह 40,000 किलो घी की नींव के इस्तेमाल की कहानी बीकानेर के इतिहास की सबसे रोचक में से एक है।
इस मंदिर का निर्माण 15वीं शताब्दी (लगभग 1468 ई.) में ओसवाल समाज के एक बेहद धनी घी व्यापारी सेठ भांडाशाह ने जैन धर्म के 5वें तीर्थंकर भगवान सुमतिनाथ जी को समर्पित करते हुए शुरू करवाया था।
घी की नींव के पीछे जो सबसे प्रचलित लोककथा है, वह इस प्रकार है:
मक्खी और घी की एक बूँद का किस्सा
एक दिन मंदिर के निर्माण का कार्य चल रहा था और सेठ भांडाशाह वहीं बैठकर मुआयना कर रहे थे। उनके पास घी का एक बर्तन रखा था, जिसमें अचानक एक मक्खी (कुछ कहानियों में चींटी) गिर गई।
सेठ जी पक्के जैन थे और 'अहिंसा' उनके जीवन का मूल मंत्र था। उन्होंने बेहद सावधानी से उस मक्खी को घी से बाहर निकाला। मक्खी के पंखों पर घी लगा हुआ था, इसलिए सेठ जी ने उसे अपनी जूती (या कपड़े) पर धीरे से पोंछ दिया ताकि मक्खी उड़ सके और वह घी ज़मीन पर न गिरे। सेठ जी का मानना था कि अगर घी की एक बूँद भी ज़मीन पर गिरी, तो वहाँ और चींटियाँ आएंगी और उनके पैरों तले कुचलकर मरने का पाप उन्हें लगेगा।
कारीगर का ताना और सेठ का जवाब
पास ही खड़े मुख्य कारीगर (मिस्त्री) ने यह सब देख लिया। उसे लगा कि सेठ तो दर्जे का कंजूस है जो एक बूँद घी भी बर्बाद नहीं होने देना चाहता। उसने तंज कसते हुए कहा, "सेठ जी, जब आप एक बूँद घी के लिए इतने कंजूस हैं, तो भगवान का इतना भव्य मंदिर कैसे बनवाएंगे? बीकानेर में तो वैसे भी पानी की कमी है, अगर सच्ची श्रद्धा है तो नींव में गारा बनाने के लिए पानी की जगह घी डलवा कर दिखाइए!"
40,000 किलो घी की नींव
कारीगर का यह ताना सेठ भांडाशाह के स्वाभिमान और उनकी धर्म के प्रति श्रद्धा को चुभ गया। उन्होंने उसी क्षण यह फैसला किया कि भगवान सुमतिनाथ के इस मंदिर की नींव में पानी की एक बूँद भी नहीं डलेगी।
उन्होंने आदेश दिया कि गारा (चूने और मिट्टी का मिश्रण) बनाने के लिए सिर्फ शुद्ध देसी घी का इस्तेमाल किया जाए। कहा जाता है कि इस मंदिर की नींव और शुरुआती निर्माण में लगभग 40,000 किलोग्राम (40 टन) शुद्ध देसी घी और सूखे नारियलों का उपयोग किया गया था।
आज भी दिखता है चमत्कार: इस बात का प्रमाण आज भी मिलता है। बीकानेर की भीषण गर्मी (जब तापमान 45-48 डिग्री तक पहुंच जाता है) में, इस मंदिर की लाल बलुआ पत्थर की फर्श और दीवारों से आज भी घी रिसता हुआ महसूस होता है और फर्श हल्की चिकनी हो जाती है।
यह ऐतिहासिक मंदिर बीकानेर के पुराने परकोटे वाले शहर की संकरी और प्राचीन गलियों में स्थित है। यह एक अन्य प्रसिद्ध और ऐतिहासिक स्थल श्री लक्ष्मीनाथ जी मंदिर के बिल्कुल करीब है। ऊंचे टीले पर स्थित होने के कारण, इस मंदिर की ऊपरी मंजिल से पूरे बीकानेर शहर का बेहद खूबसूरत और विहंगम दृश्य दिखाई देता है।
सोर्स:-wikipedia