
जिला प्रमुख : ईमानदारी के ऐसे पैमाने, जहां हिसाब भी शर्मा जाए!
जिला प्रमुख इन दिनों चर्चा में हैं। वजह भी मामूली नहीं है—बीते पांच साल में चाय-पानी, गाड़ी, तेल और दूसरे खर्चों पर करीब 1 करोड़ 70 लाख रुपए खर्च होने की चर्चा है। अब इसमें चाय कितनी थी, पानी कितना था और बाकी क्या-क्या था, इसका हिसाब-किताब जानने वाले ही जानें। कुछ लोग तो इसमें शराब तक की कल्पना कर बैठे हैं। लेकिन हम ऐसी कल्पनाओं के जिम्मेदार नहीं हैं।
जिला प्रमुख की ईमानदारी के किस्से भी खूब मशहूर हैं। सरकारी कर्मचारी उन्हें बेहद ईमानदार बताते हैं। आखिर नौकरी भी कोई छोटी चीज नहीं होती, इसलिए सरकारी कर्मचारी जो कहते हैं, उसमें सरकारी मर्यादा का ध्यान रखना भी जरूरी है।
कुछ आलोचक तो उन्हें उत्तर भारत का सबसे बड़ा ‘फ्रोड’ तक बता देते हैं। लेकिन हम ऐसे लोगों की बातों से कतई सहमत नहीं हैं। हमारी नजर में तो जिला प्रमुख उन चुनिंदा प्रतिभाशाली लोगों में हैं, जिन्होंने राजनीति में खर्चे और हिसाब-किताब का नया दर्शन समझाया है।
कहते हैं कि जिला प्रमुख का सपना विधायक बनने का भी था। जनता ने बड़ी मुश्किल से कुछ विधानसभा क्षेत्रों को इस संकट से बचा लिया। वरना विरोधियों की मानें तो विधायक बनने के बाद ट्रैक्टर, आटा चक्कियां और न जाने क्या-क्या नीलाम होने की नौबत आ जाती। हालांकि यह भी हम नहीं कह रहे, लोग कहते हैं। हम तो केवल लोगों की कल्पनाशक्ति को सलाम कर रहे हैं।
कुछ जलने वाले तो यहां तक कहते हैं कि जिला प्रमुख को दाम सही मिल जाए तो किसी की भी बोली लगाने से पीछे नहीं हटेंगे। लेकिन ये सब वही लोग हैं जिन्हें किसी की तरक्की देखकर एलर्जी हो जाती है। असलियत में जिला प्रमुख तो बेहद मिलनसार व्यक्ति हैं। चोरी उनसे सौ कोस दूर रहती है और शराब तो शायद उनसे सौ कोस और दूर।
कलयुग का दुर्भाग्य देखिए—योग्य आदमी को जनता बदनाम कर देती है। वरना जिला प्रमुख से ज्यादा साफ-सुथरा नेता कहां मिलेगा! हराम का एक पैसा लेना तो दूर, उनके सामने ऐसा पैसा आए तो शायद पैसा ही शर्म से अपना रास्ता बदल ले।
जनता को भी ऐसे नेता बेहद पसंद आते हैं। कुछ लोग तो कहते हैं कि जिस दिन जिला प्रमुख किसी को पसंद कर लें, समझो उसके अच्छे दिन शुरू। और जिन्हें पसंद न करें, वे अपनी जमाबंदी, ट्रैक्टर और आटा चक्की के कागज संभालकर रखें।
हमारी तो भगवान से बस यही प्रार्थना है कि जिला प्रमुख प्रदेश के मुख्यमंत्री बनें। आखिर प्रदेश को भी तो ऐसे ‘ईमानदार’, ‘मिलनसार’ और ‘व्यावहारिक’ नेतृत्व की जरूरत है।
बाकी रही 1 करोड़ 70 लाख की बात, तो भाई साहब—चाय-पानी का हिसाब पूछना भी कोई अच्छी बात है क्या? कहीं ऐसा न हो कि अगली बार चाय के साथ हिसाब-किताब भी महंगा पड़ जाए! 😂
ईर्ष्या भाव रखने वालों का तो यहाँ तक कहना है कि पाँच साल तक सरकारी गाड़ी को निरीक्षण और जन सुनवाई के नाम पर दौड़ाते रहे और दो सफारियों को खस्ताहाल में पहुंचाया , उन निरीक्षणों का भी कभी कोई प्रतिवेदन सामने नहीं आया कि आखिर कौन से विकास कार्यों का निरीक्षण और जन सुनवाई कर रहे थे, इन कामों में क्या कमियाँ मिलीं। लेकिन अब ये लोग नहीं समझते कि आखिर निरीक्षण तो किया ही होगा। अगर लॉग बुक में सुबह सात से रात नौ बजे तक गाड़ी चलाई है तो बिना निरीक्षण कोई इतने बड़े पद वाला व्यक्ति रह सकता है क्या। निरीक्षण करना ही तो इनका मुख्य काम था। लोगों को अगर यकीन न हो तो लॉग बुक देख लो, निरीक्षण के दौरान होमगार्ड भी साथ रहे हैं। ये वही होम गार्ड हैं जो घर और दफ्तर की सुरक्षा में लगाए थे लेकिन निरीक्षण में जान को खतरा था इसलिए घर और दफ्तर की सुरक्षा को छोड़कर साहब के साथ ही निरीक्षण पर गए थे। आखिर इतने बड़े पद पे बैठा व्यक्ति कोई यूँ ही हर दिन गाड़ी में 40 से 50 लीटर डीजल डलवाकर 250 से 400 किलोमीटर गाड़ी थोड़ी चलाएगा। ऐसे मेहनती जनप्रतिनिधि अब आखिर कहां मिलेंगे।
Alwar, Alwar | Oct 2, 2026