
यह लेख कहीं न कहीं सामाजिक रशुकदार लोगों के लिए दर्द से प्रेरित प्रतीत होता है। यह नहीं भूलना चाहिए कि एमसीसी कांड में मृतक भी व्यापारी समाज से ही था, लेकिन आज तक उसके परिवार के लिए क्या ठोस मदद की गई?
उसके परिवार के साथ ऐसा क्यों हुआ, इस संवेदनशील विषय पर कितने लेख लिखे गए—यह भी सवाल है।
हाँ, यह स्वीकार करना होगा कि मीडिया में सक्रिय कुछ लोगों ने पूरे घटनाक्रम की परत-दर-परत पड़ताल कर सबूतों के साथ सच्चाई जनता के सामने रखी। उसी का परिणाम है कि संबंधित लोगों पर आरोप तय हो सके। अन्यथा छतरपुर का इतिहास रहा है कि यदि आरोपी प्रभावशाली या धनवान हो, तो कई बार थानों में उसका नाम तक दर्ज नहीं होता।
एक और गंभीर मुद्दे की ओर ध्यान दिलाना जरूरी है—किशोर सागर तालाब। यहाँ पूरे जिले की जनता के अधिकार वाले पानी पर अतिक्रमण हो रहा है, लेकिन इस विषय पर कलम अक्सर शांत रहती है। शायद इसलिए क्योंकि तालाब अपनी आवाज़ खुद नहीं उठा सकता, और अतिक्रमण करने वाले लोग प्रभावशाली एवं सामाजिक रूप से मजबूत हैं।
आखिर सवाल सिर्फ घटनाओं पर प्रतिक्रिया देने का नहीं, बल्कि समान संवेदनशीलता और निष्पक्षता के साथ हर मुद्दे को देखने का है। जब न्याय का तराजू व्यक्ति की हैसियत देखकर झुकने लगे, तब समाज को आत्ममंथन की आवश्यकता होती है।
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