
पिपरिया की गलियों से गुम हो रही लोक संस्कृति, कभी आल्हा-ऊदल से गूंजती थीं शामें
तुलसी नगर और गल्ला बाजार के मजदूर वर्ग ने संभाल रखी थी परंपराओं की डोर, अब मोबाइल स्क्रीन में सिमटता जा रहा मनोरंजन
1/9/2026 छगन कुशवाहा
पिपरिया। पिपरिया की पहचान सिर्फ खेत-खलिहान, बाजार और व्यापार से नहीं है। यहां की मिट्टी में लोकगीत, लोकनृत्य, वीरगाथाएं और सामूहिक उत्सवों की समृद्ध परंपरा रही है। एक समय था जब त्योहार महज कैलेंडर की तारीख नहीं, बल्कि पूरे मोहल्ले और गांव को एक साथ जोड़ने का अवसर हुआ करते थे। शाम होते ही चौपाल सजती थी, आल्हा-ऊदल की वीरगाथाएं गूंजती थीं और बच्चे-बुजुर्ग मिलकर पारंपरिक खेलों में शामिल होते थे। अब वही संस्कृति धीरे-धीरे यादों में सिमटती जा रही है।
सावन आते ही बदल जाता था मोहल्लों का माहौल
सावन का महीना शुरू होते ही पिपरिया और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में अलग ही उत्साह दिखाई देता था। रक्षाबंधन के दूसरे दिन कजलियां लेकर लोगों का एक-दूसरे के घर पहुंचना, दंडा खेलना, गेड़ी पर बच्चों और युवाओं का करतब दिखाना और लोकगीतों की गूंज आम बात थी।
इन आयोजनों में किसी एक परिवार या वर्ग की नहीं, बल्कि पूरे मोहल्ले की भागीदारी होती थी। बुजुर्ग परंपराओं की जानकारी देते थे और बच्चे उन्हें देखकर सीखते थे। इसी तरह संस्कृति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती थी।
आल्हा-ऊदल में मनोरंजन के साथ सुनाई जाती थी वीरता की कहानी
पिपरिया की पुरानी बस्तियों में शाम के समय लोग एक जगह जुटते थे। आल्हा-ऊदल की वीरगाथाओं का गायन शुरू होता तो लोग देर रात तक बैठकर सुनते थे। वीर रस से भरी इन गाथाओं में साहस, संघर्ष और शौर्य की कहानियां होती थीं।
यह सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं था। लोकगायन के जरिए नई पीढ़ी को इतिहास, वीरता और सामाजिक मूल्यों से भी परिचित कराया जाता था। इसी तरह भुजरियों की लड़ाई, दंडा, गेड़ी और अन्य पारंपरिक आयोजन भी सामाजिक मेल-जोल का माध्यम हुआ करते थे।
तुलसी नगर और गल्ला बाजार के मजदूर वर्ग ने बचाए रखी थी परंपराएं
पिपरिया के तुलसी नगर और गल्ला बाजार क्षेत्र में रहने वाला मेहनतकश मजदूर वर्ग भी इन परंपराओं को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। दिनभर मेहनत-मजदूरी के बाद यही लोग त्योहारों और लोक आयोजनों में उत्साह के साथ शामिल होते थे।
सुविधाएं कम थीं, मनोरंजन के साधन सीमित थे, लेकिन आपसी मेल-जोल और सामूहिक भागीदारी अधिक थी। त्योहार आते ही पूरा मोहल्ला एक परिवार जैसा नजर आता था।
मोबाइल ने बदल दिया मनोरंजन का तरीका
समय के साथ तकनीक ने जीवन को आसान बनाया, लेकिन मनोरंजन का स्वरूप भी पूरी तरह बदल गया। मोबाइल फोन और इंटरनेट ने दुनिया को हथेली में ला दिया। इसका असर लोक परंपराओं पर भी पड़ा है।
पहले बच्चे मैदान में खेलते थे, बुजुर्ग चौपाल पर बैठते थे और त्योहारों पर लोग एक-दूसरे के घर पहुंचते थे। अब कई बार एक ही घर में बैठे लोग अलग-अलग मोबाइल स्क्रीन में व्यस्त दिखाई देते हैं।
तकनीक का इस्तेमाल जरूरी है, लेकिन सवाल यह है कि कहीं यही तकनीक हमारी सामूहिक संस्कृति और आपसी संवाद की जगह तो नहीं ले रही।
बुजुर्गों के पास है संस्कृति का पूरा खजाना
आज भी पिपरिया के कई बुजुर्गों के पास पुरानी लोक परंपराओं से जुड़ी यादों का खजाना है। उन्हें पता है कि पहले कजलियां कैसे मनाई जाती थीं, गेड़ी कैसे खेली जाती थी, आल्हा कैसे गाया जाता था और भुजरियों के आयोजन किस तरह होते थे।
जरूरत है कि इन बुजुर्गों की यादों को दर्ज किया जाए। उनके अनुभवों और लोकगीतों की रिकॉर्डिंग की जाए, ताकि आने वाली पीढ़ी अपनी ही मिट्टी की संस्कृति से परिचित हो सके।
गोंड परंपरा और स्थानीय लोक विरासत भी पहचान का हिस्सा
पिपरिया और आसपास का क्षेत्र मध्य भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ा रहा है। क्षेत्र की लोक मान्यताएं, पारंपरिक आयोजन और स्थानीय विरासत यहां की सामाजिक पहचान का हिस्सा हैं।
ऐसे में यदि लोकगीत, लोकनृत्य, पारंपरिक खेल और वीरगाथाएं धीरे-धीरे खत्म होती गईं तो आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों से जुड़ी कई महत्वपूर्ण कहानियों से अनजान रह जाएंगी।
मोबाइल को संस्कृति बचाने का माध्यम बनाया जा सकता है
लोक संस्कृति को बचाने के लिए मोबाइल और डिजिटल माध्यम को ही उपयोगी बनाया जा सकता है। बुजुर्गों से आल्हा-ऊदल और लोकगीतों की रिकॉर्डिंग कराई जाए। पारंपरिक खेलों और दंडा-गेड़ी जैसे आयोजनों के वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर साझा किए जाएं।
स्कूलों और सामाजिक संगठनों के माध्यम से लोक संस्कृति महोत्सव, गेड़ी प्रतियोगिता, आल्हा गायन, पारंपरिक खेल और लोकगीतों के कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं।
संस्कृति को सिर्फ किताबों में सुरक्षित रखने से नहीं, बल्कि उसे दोबारा जीवन में उतारने से बचाया जा सकता है।
पिपरिया की गलियों में फिर आल्हा-ऊदल की आवाज गूंजे, कजलियों के रंग दिखाई दें, गेड़ी पर बच्चे खेलें और त्योहारों पर लोग मोबाइल स्क्रीन से बाहर निकलकर एक-दूसरे से मिलें—तभी पुरानी लोक परंपराओं की डोर आने वाली पीढ़ी तक पहुंच सकेगी।
क्योंकि जिस समाज को अपनी संस्कृति याद रहती है, वह अपनी पहचान कभी नहीं भूलता।
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