खबर जो समाज की संवेदनशीलता को आईना दिखाती है-
जिस व्यक्ति ने #उत्तराखंड राज्य आंदोलन की लड़ाई लड़ी, #उनकी मृत्यु पर कंधा देने कुल जमा #सात लोग भी नहीं मिल पाए, #गजब की बात है कि #उन्हे राज्य आंदोलनकारी की पेंशन तक नहीं मिल पाई।
#उत्तराखंड राज्य निर्माण के लिए संघर्ष करने वाले #डॉ लक्ष्मण सिंह खनका पंचतत्व में विलीन हो गए। #कुमाऊं विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और #उत्तराखंड क्रांति दल के संस्थापक #डी डी पंत के शिष्य रहे #डॉ खनका ने राज्य बनने के बाद गुमनामी भरी जिंदगी को जिया , यहां तक कि #उन्हें राज्य आंदोलनकारी पेंशन तक मुहैया नहीं हुई।
#राज्य निर्माण के लिए समर्पित डॉ खनका #राज्य निर्माण की लडा़ई के ऐसे ही उन चंद सिपाहियों में थे जिन्होंने राज्य निर्माण के बाद #तंगी और गुमनामी भरी जिंदगी बिताई।
#व्यवस्था की उपेक्षा का शिकार डा खनका दशकों तक #आर्थिक तंगी और प्रचार से दूर #जीवन जीने पर मजबूर हुए, #कुछ समय के लिए उन्होंने #रानीखेत के #मीना बाजार की खोखा लाइन में आजीविका के लिए खोखा चलाया तो कभी वे जंगल में बकरियों के साथ नजर आते थे।
#डॉ खनका प्रतिभाशाली व्यक्ति थे उन्होंने कुमाऊं विश्वविद्यालय नैनीताल से भूगोल विषय में #पीएचडी की उपाधि हासिल की थी। उन्होंने जीवन को अत्यंत सादगी और सौम्यता के साथ जिया। सरकार ही नहीं राज्य आंदोलन के अलम्बरदार होने का दम भरने वाले #सियासती दलों की अनदेखी के कारण भी #डा खनका गरीबी, गुमनामी और तन्हाई का जीवन जीने को विवश हुए यहां तक कि उन्हें राज्य आंदोलनकारी की पेंशन तक मुहैया नहीं हुई जबकि पेंशन लपकने में अनेक #फर्जी आंदोलनकारी तक सत्ता की नजदीकियों का लाभ उठा गए।
#डा खनका की अंतिम वक्त तक उपेक्षा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि #रानीखेत में उनकी अंत्येष्टि के वक्त कुल जमा सात लोग ही मौजूद रहे। #उनकी चिता को उनके #भाई और भतीजे ने मुखाग्नि दी।
ऐसे में समाज की चुप्पी हैरान करने वाली रही।
साभार -
विमल सती जी (वरिष्ठ पत्रकार, संपादक, प्रकृत लोक न्यूज)