
सफलता की कहानी: गृहणी से बनीं आत्मनिर्भर महिला, आजीविका मिशन ने रिंकी लोधी को दी नई पहचान
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स्व-सहायता समूह से जुड़कर बैंक बीसी, पोषण सखी और गणवेश सिलाई सहित विभिन्न गतिविधियों से प्रतिमाह 15 हजार रुपये की आय
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कभी परिवार के भरण-पोषण के लिए मजदूरी पर निर्भर रहने वाले परिवार की मासिक आय महज 2 हजार रुपये थी। सामाजिक परिस्थितियों के कारण घर से बाहर निकलना और लोगों से संवाद करना भी आसान नहीं था। लेकिन मध्यप्रदेश डे-राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़ने के बाद ग्राम हासुआ की श्रीमती रिंकी लोधी के जीवन में ऐसा बदलाव आया, जिसने उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ समाज में एक नई पहचान भी दी। आज वे विभिन्न आजीविका गतिविधियों से जुड़कर प्रतिमाह लगभग 15 हजार रुपये की आय अर्जित कर रही हैं।
स्व-सहायता समूह से शुरू हुआ आत्मनिर्भरता का सफर
श्रीमती रिंकी लोधी वर्ष 2016 में आजीविका मिशन के अंतर्गत गठित ओम स्व-सहायता समूह से जुड़ीं। समूह में उनकी भूमिका अध्यक्ष के रूप में है। समूह से जुड़ने के बाद प्रशिक्षण और क्षमता विकास के माध्यम से उन्होंने रोजगार एवं स्वरोजगार की विभिन्न गतिविधियों को समझा और उन्हें अपनाया। वर्तमान में वे बैंक बीसी, गणवेश सिलाई, पोषण सखी तथा सीएससी आईडी जैसी गतिविधियों का संचालन कर रही हैं। इन गतिविधियों से उन्हें लगभग 15 हजार रुपये प्रतिमाह तथा 1.80 लाख रुपये वार्षिक आय प्राप्त हो रही है।
शुरुआत में तकनीकी जानकारी और आवश्यक कौशल का अभाव उनके सामने बड़ी चुनौती थी। विभिन्न प्रशिक्षणों एवं क्षमता वर्धन कार्यक्रमों में सहभागिता से उन्होंने इन कठिनाइयों को दूर किया और धीरे-धीरे अपने कार्यों में दक्षता हासिल की।
दो हजार रुपये की पारिवारिक आय से 15 हजार रुपये मासिक आजीविका तक -
आजीविका मिशन से जुड़ने से पहले श्रीमती रिंकी गृहणी के रूप में परिवार की जिम्मेदारियां संभालती थीं। परिवार की आय का प्रमुख साधन मजदूरी था और कुल मासिक आय लगभग 2 हजार रुपये थी। सीमित आय में परिवार का भरण-पोषण करना कठिन था। स्व-सहायता समूह से जुड़ने के बाद उनकी आर्थिक स्थिति में निरंतर सुधार हुआ। समूह की गतिविधियों और बैंक लिंकेज के माध्यम से आर्थिक संसाधन उपलब्ध हुए। दस्तावेज के अनुसार ओम स्व-सहायता समूह को तृतीय बैंक लिंकेज के रूप में 6 लाख रुपये की राशि उपलब्ध कराने की प्रक्रिया भी की जा रही है, जिससे आय में और वृद्धि की संभावना बनी है।
कच्चे घर से पक्के मकान तक बदली जीवन की तस्वीर -
आर्थिक आत्मनिर्भरता का प्रभाव उनके परिवार के रहन-सहन पर भी दिखाई देता है। पहले उनका घर कच्चा था और आवागमन के लिए कोई वाहन उपलब्ध नहीं था। आजीविका गतिविधियों से प्राप्त आय के माध्यम से उन्होंने विदिशा में अपना पक्का मकान बनाया है। साथ ही, उनके पति के लिए दोपहिया वाहन भी लिया गया है, जिसका उपयोग रोजगार संबंधी क्षेत्र भ्रमण के लिए किया जाता है। बच्चों की शिक्षा को लेकर भी परिवार की सोच में बदलाव आया है। पहले बच्चे ग्राम के शासकीय विद्यालय में अध्ययनरत थे। अब विदिशा में मकान बनने के बाद बच्चों को शहर के अच्छे विद्यालय में पढ़ाने की कार्ययोजना है, ताकि उन्हें बेहतर शैक्षणिक अवसर मिल सकें।
घूंघट और सीमित दायरे से आत्मविश्वास और नेतृत्व तक -
रिंकी लोधी के जीवन में आया परिवर्तन केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी महत्वपूर्ण है। आजीविका मिशन से जुड़ने से पहले उनका सामाजिक दायरा सीमित था। घूंघट की परंपरा के कारण घर से बाहर आना-जाना और लोगों से मिलना-जुलना सहज नहीं था तथा कई कार्यों के लिए परिवार के सदस्यों की अनुमति आवश्यक होती थी।
स्व-सहायता समूह से जुड़ने के बाद उन्होंने 11 महिलाओं के साथ मिलकर संस्था के रूप में कार्य करना शुरू किया। धीरे-धीरे समूहों और परिवारों के साथ उनका संपर्क बढ़ता गया। समूह अध्यक्ष और ग्राम संगठन अध्यक्ष के रूप में उन्हें नेतृत्व की जिम्मेदारियां मिलीं। इसके बाद बैंक सखी, पोषण सखी, बैंक बीसी, गणवेश सिलाई सेंटर संचालक और मास्टर सीआरपी जैसी विभिन्न भूमिकाओं में काम करने का अवसर मिला। इन जिम्मेदारियों ने उनके आत्मविश्वास को मजबूत किया। जहां पहले किसी से बात करने में झिझक महसूस होती थी, वहीं अब वे वरिष्ठ अधिकारियों से भी बिना संकोच चर्चा कर लेती हैं। उनके कार्यों में पति तथा सास-ससुर का सहयोग भी मिल रहा है।
नई पहचान और आत्मनिर्भरता की मिसाल -
श्रीमती रिंकी लोधी की कहानी यह दर्शाती है कि स्व-सहायता समूह केवल बचत और ऋण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि महिलाओं को रोजगार, स्वरोजगार, नेतृत्व और आत्मविश्वास के अवसर उपलब्ध कराने का माध्यम भी बन सकते हैं। एक समय परिवार की सीमित आय और सामाजिक परिस्थितियों के बीच जीवन यापन करने वाली रिंकी आज विभिन्न आजीविका गतिविधियों से जुड़कर अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत कर रही हैं। बैंक बीसी से लेकर पोषण सखी, गणवेश सिलाई और सीएससी जैसी गतिविधियों में उनकी सक्रिय भागीदारी ने उन्हें गांव की एक सामान्य गृहणी से आगे बढ़ाकर आत्मनिर्भर महिला और समूह नेतृत्वकर्ता के रूप में नई पहचान दी है। #Vidisha