
क्या लोकतंत्र में अपनी पसंद होना भी अब किसी के विरोध में खड़ा होना माना जाएगा? क्या किसी व्यक्ति, दल या विचारधारा से असहमति का मतलब यह है कि आप उसके खिलाफ हैं?
राजनीति में इन दिनों एक अजीब प्रवृत्ति दिखाई देती है। यदि आपकी सोच किसी खास व्यक्ति या विचारधारा से पूरी तरह मेल नहीं खाती, तो आपको तुरंत विरोधी खेमे में खड़ा कर दिया जाता है। जैसे लोकतंत्र में अलग-अलग विचारों के लिए जगह नहीं, बल्कि सिर्फ एक ही सोच को स्वीकार करने की बाध्यता हो।
लेकिन लोकतंत्र की खूबसूरती ही यही है कि हर व्यक्ति को अपनी राजनीतिक और वैचारिक समझ बनाने का अधिकार है। किसी नेता की किसी नीति से सहमत होना जरूरी नहीं, उसी तरह किसी नेता के हर निर्णय का विरोध करना भी जरूरी नहीं। समर्थन और विरोध के बीच एक तीसरी जगह भी होती है "स्वतंत्र विचार"।
किसी व्यक्ति के कुछ कार्य पसंद आ सकते हैं और कुछ नहीं। किसी विचारधारा के कुछ सिद्धांत स्वीकार्य लग सकते हैं और कुछ पर सवाल उठ सकते हैं। इसका अर्थ यह कतई नहीं कि यह समझ रखने वाला व्यक्ति किसी व्यक्ति विशेष या समाज के खिलाफ खड़ा है या किसी अपने विचारधारा या नेता का समर्थक बन गया है। लेकिन आज के परिदृश्य में विडंबना यह है कि कुछ लोग अपनी राजनीतिक सोच को ही समाज की सामूहिक सोच मान बैठते हैं। शायद उन्हें यह याद दिलाने की जरूरत है कि समाज किसी एक व्यक्ति की विचारधारा की जागीर नहीं है। आपकी राय आपकी है, मेरी राय मेरी और समाज की राय समाज खुद तय करेगा।
राजनीति पटल पर असहमति को दुश्मनी और स्वतंत्र सोच को विरोध मान लेना लोकतांत्रिक संवाद को कमजोर करता है। लोकतंत्र में विचारों का टकराव होना स्वाभाविक है, लेकिन हर अलग विचार को शत्रुता का नाम देना लोकतंत्र की भावना के विपरीत है। बरहाल बस बात इतनी सी है कि समाज के ठेकेदार बनने से पहले हम सबको यह समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र में जनता किसी एक व्यक्ति विचारधारा की अनुयायी नहीं होती। और हां, इसमें “मैं” भी शामिल हूं। मेरी सोच पूरे समाज की सोच नहीं हो सकती, ठीक उसी तरह आपकी सोच भी नहीं।
लेख़क: गुलशन आजाद
संपादक: जनवाणी एक्सप्रेस