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"ताला दफ्तर पर, चाबी रसूख के पास!"साहब का "नेटवर्क" मोबाइल कंपनी से नहीं, राजनीति से चलता है। जशपुर जंक्शन,योगेश थवाईत जशपुर नगरपालिका में इन दिनों सबसे बड़ा विकास कार्य सड़क,नाली या सफाई नहीं, बल्कि सीएमओ साहब की खोज बन गया है। एक ओर मुख्यमंत्री पूरे प्रदेश में सुशासन, पारदर्शिता, जवाबदेही और समयबद्ध कार्य संस्कृति का संदेश देने में जुटे हैं, वहीं दूसरी ओर उनके ही गृह जिले की नगरपालिका में अधिकारी की कार्यशैली इन दावों को चुनौती देती नजर आ रही है। लोग पूछ रहे हैं कि आखिर साहब कार्यालय में मिलेंगे या उनकी तलाश के लिए भी कोई विशेष अभियान चलाना पड़ेगा? सुना है कि घड़ी दस बजा देती है, कलेक्टर समय पर पहुंच जाते हैं, अधिकारी कतार में खड़े हो जाते हैं, लेकिन साहब का टाइम ज़ोन शायद किसी और ग्रह से संचालित होता है। सरकारी समय और साहब का समय, दोनों का आपस में शायद वर्षों से कोई परिचय नहीं है। आज तो कमाल ही हो गया। निरीक्षण के लिए कलेक्टर पहुंचे, अधिकारी पहुंचे, लेकिन साहब नहीं पहुंचे। नतीजा कार्यालय पर ताला लग गया। मगर ताले से घबराना भी किसे था? जिनकी अनुपस्थिति ही चर्चा का विषय हो, उनके लिए बंद दफ्तर भी शायद सामान्य बात हो। शहर में एक और चर्चा खूब चल रही है। कहा जा रहा है कि साहब का "नेटवर्क" मोबाइल कंपनी से नहीं, राजनीति से चलता है। लोग दावा करते हैं कि उनका राजनीतिक सिग्नल इतना मजबूत है कि प्रशासनिक नोटिस की रेंज वहां तक पहुंच ही नहीं पाती। यह चर्चा कितनी सही है, यह तो जांच और आधिकारिक तथ्यों से ही स्पष्ट होगी, लेकिन सवाल जरूर उठ रहे हैं। जशपुर एसडीएम का यह कहना कि बिना सूचना कई कई दिनों तक अनुपस्थित रहने से जनता के काम प्रभावित होते हैं और नोटिस तक जारी करना मुश्किल हो जाता है क्योंकि अधिकारी कार्यालय में मिलते ही नहीं, अपने आप में गंभीर टिप्पणी है। यदि यह स्थिति सही है तो सवाल केवल एक अधिकारी की अनुपस्थिति का नहीं, बल्कि पूरी जवाबदेही व्यवस्था का है। जनता अब मजाक में कहने लगी है कि नगरपालिका के बाहर नया बोर्ड लगा देना चाहिए "सीएमओ कार्यालय : खुलने का समय राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर।" या फिर... "यदि अत्यंत आवश्यक कार्य हो तो कृपया पहले यह पता करें कि साहब आज किस जिले, किस बैठक या किस प्रभाव क्षेत्र में उपलब्ध हैं।" लोकतंत्र में कुर्सी का सम्मान व्यक्ति से बड़ा होता है। यदि किसी अधिकारी के बारे में यह धारणा बनने लगे कि वह नियमों से अधिक रसूख के भरोसे चल रहा है, तो यह केवल उस अधिकारी की नहीं, पूरे प्रशासनिक तंत्र की विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़ा करता है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि मुख्यमंत्री लगातार सुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही की बात करते हैं, लेकिन यदि किसी अधिकारी के कामकाज को लेकर ऐसी शिकायतें लगातार सामने आती रहें और उन पर समय रहते प्रभावी कार्रवाई न दिखे, तो उसका असर सरकार की छवि पर भी पड़ता है। आम जनता अधिकारी और सरकार के बीच कोई अलग रेखा नहीं खींचती। जनता की नजर में अधिकारी ही सरकार का चेहरा होता है। ऐसे में यदि किसी अधिकारी की कार्यशैली पर लगातार सवाल उठते रहें, तो इससे मुख्यमंत्री के सुशासन के संदेश पर भी स्वाभाविक रूप से असर पड़ता है। अब निगाहें जांच और प्रशासनिक कार्रवाई पर हैं। क्योंकि यदि कार्यालय पर ताला लग जाए और व्यवस्था फिर भी न बदले, तो जनता यही पूछेगी "ताला दफ्तर पर लगा है... या जवाबदेही पर?" और आखिर में जनता का वही पुराना सवाल "साहब बड़े हैं या व्यवस्था?" यदि व्यवस्था से ऊपर कोई नहीं है, तो फिर नियम सबके लिए बराबर कब होंगे?

Jashpur, Jashpur | Jul 25, 2026

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भजन बिना देहियाँ न सोहे रामा

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Jashpur, Jashpur | Jul 30, 2026

हाल ए बतौली बगीचा स्टेट हाईवे....
लोक निर्माण विभाग के अधिकारी सरकार की छवि खराब करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे.....

सनद रहे "सड़क सरकार का आईना होती है"

सड़क खराब हो तो पहली बात जुबां पर आती है कैसी सरकार है....सड़क तक नहीं बनवाती...पर जब सरकार सड़क के लिए विभाग को पैसे दे चुकी टेंडर हो गया...ठेकेदार को वर्क ऑर्डर मिल गया....तो ईई,इंजीनियर और एसडीओ की शत प्रतिशत जिम्मेदारी होती है कि वह ठेकेदार से बेहतर काम कराए, यात्रियों को आवागमन में कोई दिक्कत न हो ...यहां तो दिक्कत हो दिक्कत है.....28 किलोमीटर में बतौली से गड्ढों की शुरुआत होती है जो दुर्गापारा तक कमर तोड़ रही है....पुलिया के डायवर्शन में पानी भरा हुआ है....गड्ढों को भरने के लिए डाला गया जीएसबी कीचड़ हो चुका है...गाड़ियां फंस रही है.....

जब सड़क बरसात में नहीं बनानी थी तो उखाड़ना नहीं था पर...कैसे भी करके बंदरबाट जो करना है....

अच्छा है करते रहिए और सरकार की छवि को दागदार बनाते रहिए

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Jashpur, Jashpur | Jul 30, 2026