
माँ नंदादेवी का चोरसिंग्या खाडू यहाँ से हो जाता है आँखों से ओझल! इसका रहस्य आजतक कोई नहीं समझ पाया! कि आखिर वो खाड़ू कहां हो जाता है गायब?
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माता नंदा देवी की विग्रह डोली जब निर्जन और दुर्गम पहाड़ों से होते हुए होमकुंड (समुद्र तल से करीब 16,000 फीट की ऊंचाई) पहुंचती है, तो वहां अंतिम हवन-यज्ञ संपन्न किया जाता है। इसके बाद चौसिंग्या खाड़ू की पीठ पर मां नंदा के लिए लाई गई श्रृंगार सामग्री, वस्त्र और भोजन (रोली-पिठ्याँ) बांध दिए जाते हैं।कैलाश की ओर प्रस्थान: यज्ञ पूरा होने के बाद इस खाड़ू की बलि नहीं दी जाती, बल्कि उसे स्वतंत्र छोड़ दिया जाता है। माना जाता है कि वह मां नंदा का शुभदूत (संदेशवाहक) है। छोड़े जाते ही वह इंसान की मदद के बिना, अकेले ही बर्फ से ढके दुर्गम त्रिशूल और कैलाश पर्वत की खड़ी चढ़ाई की ओर तेजी से बढ़ने लगता है।रहस्यमयी तरीके से गायब होना: स्थानीय लोगों और तीर्थयात्रियों के अनुसार, खड़ी चट्टानों पर चढ़ते हुए कुछ दूरी तक तो खाड़ू साफ दिखाई देता है, लेकिन फिर अचानक वह पलक झपकते ही गायब हो जाता है। कई लोगों और शोधकर्ताओं ने यह जानने की कोशिश की कि वह इतनी ऊंचाई पर हाड़ कंपाने वाली ठंड और ऑक्सीजन की कमी के बीच कहां चला जाता है, लेकिन आज तक इसका कोई वैज्ञानिक या भौतिक प्रमाण नहीं मिल सका है।