
Communication - संवाद
इस फोटो में मेरे साथ दिख रहा यह व्यक्ति एक चाइनीज़ नागरिक है। इसका नाम है “काइ”
काइ पेशे से चाइना में एक सिविल इंजीनियर था, लेकिन हायर स्टडीज और शायद विदेश में बसने के सपने के साथ कुछ वर्ष पहले न्यूज़ीलैंड आ गया। चीन में अपनी पत्नी और ५-६ वर्षीय बच्चे को छोड़कर पिछले करीब १० महीने से यह मेरे साथ घर शेयर करके रह रहा था।
न्यूजीलैंड में मकान अकेले किराए में लेना काफ़ी मंहगा पड़ता है, सबसे ज़्यादा खर्चा ही किराए में होता है। इसलिए बड़ा घर किराए में लेकर उसे सबलेट करके शेयर करके रहना “फ्लैटिंग” ज़्यादा किफायती रहता है। पिछले ११ वर्षों में विभिन्न प्रांतों के भारतीय और विदेशी बहुत से लोगों के साथ रहने/काम करने का मौक़ा मिला, अरे खेलना तो मैं भूल ही गया, क्रिकेट भी बहुत खेला।
काइ के साथ रहना इन सब अनुभवों से अलग अनुभव था, या ये कहिये कि सारे अनुभव अपने आप में यूनिक होते हैं, यह भी एक अलग अनुभव था। कारण था- Communication प्रॉब्लम। वो निरा चाइनीज़ आदमी, अंग्रेजी उतनी ही जानता है जितनी मोदी जी, जैसे मोदी जी अपने मित्र को ‘दोलांड’ करके संबोधित करते हैं, वैसे ही काइ भी मुझे अक..क्षित, टाइप का कुछ तो बोलता था।
अंतर एकमात्र लैंग्वेज का ही नहीं था, ख़ान पान का भी था, मैं शुद्ध शाकाहारी, पिछले ३-४ साल से अंडे से भी दूर। काइ तो भैया चाइनीज़ है, खाने पीने में भेदभाव नहीं करता, एक बार मेरा कोई दूसरा चाइनीज़ मित्र बड़े गर्व से (मज़ाक़ में) कह रहा था कि, ”धरती पर चलती, आकाश में उड़ती, और पानी में तैरती हर चीज हमारा भोजन है।”
“We eat everything that crawls, flies or swims.”
इस मंगलवार को काइ अपनी मास्टर्स की पढ़ाई का आख़िरी प्रेजेंटेशन ख़त्म करके, अच्छे रोजगार के अवसर की तलाश में न्यूजीलैंड के सबसे बड़े शहर ऑकलैंड में शिफ्ट हो गया, तो मुझे पिछले १० महीने रिफ्लेक्ट करने का मौक़ा मिला।
पिछले १० महीने में एक भी मौका नहीं आया जब हमारे बीच कोई विवाद हुआ हो, उसका कारण था एक दूसरे के लिए कंसीडरेट होना। एक दूसरे की संस्कृति, रहन सहन, आदतों इत्यादि को समझना और सम्मान करना। काइ को पता था भाई ये शाकाहारी लोग हैं, तो वो पूरी कोशिश करता था कि घर में मांस की बदबू ना आए, इसलिए मांस पकाते वक्त एग्जॉस्ट के साथ दरवाज़े खिड़कियां भी खोल देता था, और मैं यह समझता था कि भई जो वो बना रहा है वो उसका भोजन है, मैं वह सब नहीं खाता इसका अर्थ यह नहीं है कि वो ऐसा भोजन ना बनाये। इसके अलावा भी बहुत सी छोटी बड़ी बातें हैं।
यह सब आज इसलिए लिख रहा हूँ कि जिन लोगों तक मेरी बात पहुँच रही है, वे ये समझें कि काफ़ी सारी समस्याएँ सिर्फ़ एक कम्युनिकेशन गैप या संवाद की कमी के कारण उत्पन्न होती हैं, और बहुत सारी ग़लतफ़हमियाँ तो सिर्फ़ २ मिनट की बातचीत से दूर हो जाती हैं। सामने वाले की बातें प्रेम पूर्वक समझकर और अपनी बातें विनम्रतापूर्वक समझाकर समस्याओं के हल निकल आते हैं।
तावबाज़ी से आप ख़ुद देख लो कितना पागलपन दुनिया में छा रखा है, और मिलता क्या है अंत में ? सालों के युद्ध के बाद अंत में समस्याएँ बातचीत और आपसी समझदारी से ही निपटाई जाती हैं।
प्रेम प्रेम में तो पाकिस्तानी पठान भी गढ़वाली ब्राह्मण को अपने घर शाकाहारी भोजन के लिए आमंत्रित करता है - but that’s a story for another day. 🫡
अक्षित बड़थ्वाल उक्रांद
केंद्रीय उपाध्यक्ष- उक्रांद प्रवासी प्रकोष्ठ
सह संपादक- जागो उत्तराखंड