
"वो यादों के मंज़र वो माज़ी की बातें"
मनमोहन सिंह 'दानिश'
कल 10 अक्टूबर को पांवटा साहिब में हमारे प्रोफेसर संतोष कुमार का 95 वां जन्म दिवस मनाया गया। अतीत की सभी बातें मेरे मानसपटल पर किसी चलचित्र के तरह उभर आईं। मेरे लिए गौरव की बात थी कि जिस महान शख्सियत को लोग उनके गुज़र जाने के 13 साल बाद भी याद कर रहे थे मेरा उनसे बहुत करीबी रिश्ता रहा था। उन्होंने मुझे डिग्री कॉलेज सोलन में पढ़ाया था। उनकी बहुआयामी शख्शियत के सभी लोग कायल थे। आज के समय में जब लोग अपने माता पिता के गुज़र जाने के दो चार साल के बाद ही उन्हें भुला देते हैं तो उनके छात्रों, उनके दोस्तों, और चाहने वालों ने उन्हें उनके जाने के 13 साल बाद भी याद रक्खा यह उनकी शख्शियत को दर्शाता है। असल में लोग उन्हें उनके बहुआयामी व्यक्तित्व के लिए और समाज के लिए किये गए उनके कामों के लिए याद रखे हुए हैं।
इस सारे आयोजन का अगर श्रेय किसी को जाता है तो वह है उनका छात्र राजेश कुमार। लोग संतोष सर को याद तो करते हैं पर उन सब को इकट्ठा करना और फिर एक कार्यक्रम आयोजित करना, और उनके जीवन को दर्शाती एक स्मारिका निकलना केवल राजेश की अपने गुरू को सच्ची श्रद्धांजलि है। इसके साथ ही राजेश ने हम लोगों को इसमें शामिल किया। कुछ लोग सोलन से भी पहुंचे थे।
सच्च पूछो तो उस लगभग तीन घंटे तक चले कार्यक्रम के तहत मैं अपनी किशोर अवस्था में ही रहा। डिग्री कॉलेज सोलन के क्लास रूम्स, संतोष सर का पढ़ना, उनकी डांट, उनका प्यार, उनकी बच्चों जैसी उन्मुक्त हसीं सब मेरे जहन में चलते रहे। मुझे लगता है कि आज भी हमें उनके मार्गदर्शन की उतनी ही ज़रूरत है जितनी उस समय थी। आज वे हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनका स्वाभिमान, उनकी बेवाक बातें और "रात को रात" कहने का हौसला आज भी हमें प्रेरित करता है। मुझे नहीं पता कि आदमी की सफलता का पैमाना क्या है? क्या अकूत धन संपत्ति, जुटाने वाला सफल है या शिक्षा का दान देने वाला? पर मेरे लिए उससे बढ़ कर कोई नहीं जो आदमी को इंसान बना दे। और यह काम कोई शिक्षक ही कर सकता है। आज मुझे बचपन में देखी वी शांता राम की फिल्म "दो आंखें बारह हाथ" का अंतिम सीन याद आता है जब फिल्म का नायक छह डाकुओं को सुधार देता है लेकिन खुद ज़िंदा नहीं रहता। पर डाकू उस आज़ाद नगर को छोड़ कर नहीं जाते और उन्हें लगता कि "बाबू जी" की दो आंखें उन्हें अभी भी आसमान से देख रही हैं कि वे क्या कर रहे हैं। शायद संतोष कुमार सर की की नज़रें भी हम पर हों कि हम क्या कर रहें हैं। बस अंत में इतना ही कहना चाहता हूं:
" नमी आँखों में है सब के अभी बरसात बाकी है
चिरागों को न बुझने दो अभी तो रात बाकी है"