
रांची: झारखंड की लोक संस्कृति और आदिवासी पहचान की धड़कन माने जाने वाले पारंपरिक वाद्य यंत्र ‘मांदर’ को प्रतिष्ठित ज्योग्राफिकल इंडिकेशन (GI) टैग मिल गया है। करम, सरहुल, लोक नृत्यों और सामाजिक उत्सवों में गूंजने वाली मांदर की थाप अब कानूनी और भौगोलिक रूप से वैश्विक पटल पर संरक्षित हो गई है।
मांदर की अनूठी बनावट, स्थानीय मिट्टी का ढांचा और विशिष्ट गंभीर ध्वनि इसे अन्य ताल वाद्यों से अलग बनाती है। इसे जीआई टैग दिलाने की प्रक्रिया वर्ष 2021 में शुरू हुई थी, जिसमें नुसर्ल (NUSRL), रांची के बौद्धिक संपदा विशेषज्ञ डॉ. सत्यदीप सिंह की अहम भूमिका रही। मांदर की ऐतिहासिकता को साबित करने के लिए मानवशास्त्री शरत चंद्र राय (1915), डब्ल्यू. जी. आर्चर की पुस्तक 'द ब्लू ग्रोव' (1940) और पटना संग्रहालय की 1920 की रिपोर्ट जैसे दस्तावेजों का सहारा लिया गया।
इस मान्यता से नकली उत्पादों पर रोक लगेगी और मांदर तैयार करने वाले स्थानीय पारंपरिक कारीगरों को बेहतर आर्थिक अवसर मिलेंगे। साथ ही, झारखंड की इस समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ा बाजार मिलेगा।
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