
सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हो रहे जस्टिस संजय करोल ने अपने विदाई भाषण में न्यायपालिका को लेकर बेहद अहम बात कही। उन्होंने कहा कि जज भगवान नहीं होते और उनसे हर फैसला सही होने की उम्मीद नहीं की जा सकती। उनके मुताबिक, एक जज के लिए कानून लागू करने से ज्यादा जरूरी यह समझना है कि अदालत के सामने खड़े व्यक्ति ने क्या खोया है और वह न्याय की उम्मीद लेकर क्यों आया है।
जस्टिस संजय करोल ने कहा कि जजों के हाथ में हमेशा एक बात रहती है कि वे सिर्फ याचिकाकर्ता को नहीं, बल्कि उसके पीछे मौजूद इंसान को देखें। उनके मुताबिक, किसी याचिका से मामले के तथ्य तो पता चल सकते हैं, लेकिन यह नहीं पता चलता कि उस व्यक्ति ने पहले से क्या खोया है या वह अदालत से क्या उम्मीद कर रहा है। उन्होंने कहा कि शायद इसी वजह से फैसला सुनाने के लिए एक खास स्तर की विनम्रता जरूरी होती है।
उन्होंने संविधान और न्याय के संबंध पर भी बात की। जस्टिस करोल ने कहा कि संविधान न्यायाधीशों से केवल कानून को सही तरीके से लागू करने की अपेक्षा नहीं करता, बल्कि उसे न्यायपूर्ण तरीके से लागू करने की जिम्मेदारी भी देता है। उन्होंने कहा कि उनके लिए फैसला सुनाने की जिम्मेदारी केवल यह तय करने तक सीमित नहीं रही कि कानूनी तौर पर कौन सही है।
विदाई भाषण में जस्टिस करोल ने अपने करीब चार दशक लंबे कानूनी सफर को भी याद किया। उन्होंने बताया कि उन्होंने लगभग 40 साल कोर्टरूम में बिताए, जिसमें शुरुआती दौर में वकील के तौर पर और पिछले 19 साल से जज के तौर पर काम किया। वह 6 फरवरी 2023 को सुप्रीम कोर्ट के जज बने थे और 22 अगस्त 2026 को सेवानिवृत्त हुए।
जस्टिस करोल ने कोर्टरूम में मौजूद उन 'खामोशियों' का भी जिक्र किया, जिनमें उनके मुताबिक बहुत कुछ छिपा होता है। उन्होंने कहा कि वकीलों की बातों के साथ-साथ उनकी खामोशी को सुनना भी न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है। उनका कहना था कि लोगों के शब्दों के बीच छिपी बातों को समझना भी एक जज की जिम्मेदारी है।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के कोर्टरूम नंबर 1 में 1996 में अपनी पहली यात्रा को याद करते हुए बेंच की ऊंचाई का उदाहरण दिया। उनके मुताबिक, नीचे से देखने पर ऊंची बेंच अधिकार और सत्ता का प्रतीक लग सकती है, लेकिन उस पर बैठने के बाद उसका अर्थ अलग महसूस होता है। उनके लिए यह गरिमा और ईमानदारी के साथ जिम्मेदारी निभाने का प्रतीक था।
जस्टिस करोल ने न्याय व्यवस्था में आम नागरिक के भरोसे को सबसे महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का वास्तविक महत्व उस भरोसे में है, जिसके साथ आम नागरिक यह उम्मीद लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाता है कि कोई उसकी बात सुनेगा। साथ ही उन्होंने उन लोगों को भी याद रखने की जरूरत बताई जो कभी अदालत तक पहुंच ही नहीं पाते, क्योंकि उनके लिए न्याय बहुत दूर, महंगा या डरावना हो सकता है।
उन्होंने कहा कि जज का कर्तव्य है कि अदालत के सामने खड़े हर व्यक्ति की बात सुनी जाए, चाहे वह कितना भी छोटा या बेबस क्यों न हो। उन्होंने न्याय को केवल कोर्टरूम और जजों के लिबास तक सीमित न मानते हुए व्यक्तिगत आचरण और जिम्मेदारी से भी जोड़ा।
जस्टिस संजय करोल की विदाई के मौके पर चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत और सुप्रीम कोर्ट बार के वरिष्ठ सदस्यों ने भी उनके कार्यकाल को याद किया। उनके रिटायरमेंट के साथ सुप्रीम कोर्ट में उनका साढ़े तीन साल से अधिक का कार्यकाल समाप्त हुआ।
Gormi, Bhind | Aug 23, 2026