
दिल तो बहुत पहले दिया था, अब किडनी देकर पति को मौत से लौटा लाईं - 10 अक्टूबर जन्मदिन है शिमला के उस 'वेला' बॉबी का जो रोज 3000 भूखे पेट भरते हैं
शिमला। 10 अक्टूबर जन्मदिन है उस शख्स का, जिन्हें लोग प्यार से वेला बॉबी कहते हैं और अस्पताल में पड़ा मरीज मसीहा कहता है। पूरा नाम सरबजीत सिंह बॉबी जी।
10 अक्टूबर 1973 को शिमला के रिपन अस्पताल में इनका जन्म हुआ था। सेंट एडवर्ड्स स्कूल में छठी कक्षा में पढ़ते थे, तभी परिवार की स्थिति बिगड़ गई। तीन छोटी बहनों को पढ़ाना था, इसलिए 12 साल की उम्र में ही इन्होंने किताबें बंद कर दीं और लोअर बाजार में जूतों की दुकान संभाल ली।
25 अक्टूबर 2014 को IGMC कैंसर अस्पताल के बाहर इन्होंने एक केतली चाय से लंगर शुरू किया था, जो आज इनकी संस्था 'अलमाइटी ब्लेसिंग्स' के जरिए रोज 3000 से ज्यादा मरीजों और परिजनों का पेट भरता है। अब तक लाखों लोग भोजन कर चुके हैं।
**और जब मंडी डूब रहा था, तब ये फरिश्ता बनकर पहुँचे**
हिमाचल इस साल बाढ़ में रोया था। सबसे ज्यादा दर्द मंडी, सेराज और कुल्लू ने सहा। घर बह गए, रसोई उजड़ गई, सरकार के कागजों में राहत अटकी रही, लेकिन मंडी के बाढ़ पीड़ितों के लिए उस वक्त एक ही नाम फरिश्ता बना - वेला बॉबी।
जो काम बड़े-बड़े दावों में अटका था, वो काम बॉबी भाई जी ने करके दिखा दिया। इन्होंने लोगों से हाथ जोड़कर एक करोड़ रुपये से ज्यादा की मदद जुटाई। ट्रकों में भरकर राशन, कंबल, बर्तन और खाने का सामान खुद लेकर मंडी के अंदरूनी गांवों तक पहुँचे। वहाँ जहाँ जीप भी नहीं जा पा रही थी।
और सबसे बड़ी बात - इन्होंने सैकड़ों परिवारों के बैंक खातों में सीधे 25-25 हजार रुपये नकद मदद डाली, ताकि कोई भी परिवार किसी के आगे हाथ न फैलाए। कोई मंच नहीं, कोई भाषण नहीं, कोई फोटो खिंचवाने की होड़ नहीं। चुपचाप मदद पहुँचाई और चुपचाप लौट आए। मंडी के लोग आज भी कहते हैं, जो सरकार समय पर नहीं कर पाई, वो बॉबी भाई ने कर दिखाया।
यही इनकी पहचान है। रात के दो बजे जब कोई शव वाहन चलाने को तैयार नहीं होता, तब ये खुद स्टीयरिंग संभालते हैं। अब तक 5000 से ज्यादा लावारिस शवों को अंतिम यात्रा करवा चुके हैं। हर रविवार रिज पर रक्तदान शिविर लगाते हैं, 30 हजार यूनिट से ज्यादा खून दे चुके हैं।
**दिल तो बहुत पहले दिया था, अब किडनी भी दे दी**
2020 में इनकी दोनों किडनी फेल हो गईं। ये जिंदगी और मौत के बीच मौत को छूकर वापस लौटे हैं। तब इनकी धर्मपत्नी जी ढाल बनकर सामने आईं। दिल तो उन्होंने 25 साल पहले शादी के वक्त ही दे दिया था, इस बार 2021 में शादी की 25वीं सालगिरह पर अपनी एक किडनी देकर इन्हें नया जीवन दिया, ताकि इनकी समाज सेवा चलती रहे।
आज भी डायबिटीज के बावजूद इनके हाथों में वही कड़छी है।
लोग इन्हें 'वेला' कहते हैं। ये मुस्कुरा कर कहते हैं, "हाँ, मैं वेला हूँ। भगवान ने मुझे वेला इसलिए बनाया ताकि मैं आपके दर्द में शामिल हो सकूँ।"
आज इनके जन्मदिन पर शिमला और मंडी के हजारों हाथ दुआ कर रहे हैं। मंडी के वो परिवार जिनके उजड़े घरों में इन्होंने फिर से चूल्हा जलवाया, आज दिल से कह रहे हैं - जन्मदिन मुबारक हो बॉबी भाई जी, आप सलामत रहें।