परवल की खेती से संवर रही सुरसंड के किसानों की तकदीर, हर साल ₹5 से ₹6 लाख का हो रहा मुनाफा
सुरसंड पारंपरिक फसलों के अनिश्चित उत्पादन और घटती आय के बीच सीतामढ़ी जिले के सुरसंड प्रखंड से एक बेहद प्रेरणादायक खबर सामने आ रही है। यहाँ के किसान अब सब्जियों की व्यावसायिक खेती के जरिये न केवल अपनी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ कर रहे हैं, बल्कि अन्य किसानों के लिए भी सफलता की एक नई मिसाल पेश कर रहे हैं। प्रखंड के राधाउर गांव निवासी किसान बृजनंदन महतो परवल की उन्नत खेती के जरिए सालाना 5 से 6 लाख रुपये का शुद्ध मुनाफा कमा रहे हैं।
लीज की जमीन से तय किया सफलता का सफर
बृजनंदन महतो का यह सफर आसान नहीं था। उन्होंने बताया कि वर्ष 2010 में जब उन्होंने परवल की खेती करने का विचार बनाया, तब उनके पास अपने गांव में पर्याप्त जमीन उपलब्ध नहीं थी। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और दूसरे गांव में लीज (पट्टे) पर जमीन लेकर खेती की शुरुआत की।
उन्होंने इस खेती की बारीकियां अपने भाई से सीखीं। समय के साथ मिले अनुभवों और नई तकनीकों के प्रयोग से उनका यह प्रयोग बेहद सफल रहा। वर्तमान में वे 4 एकड़ जमीन पर परवल और 1 एकड़ में करेले की बड़े पैमाने पर खेती कर रहे हैं।
क्या है सफलता का राज? 'मेल-फीमेल' पौधों का संतुलन
किसान बृजनंदन महतो बताते हैं कि परवल की खेती में सबसे महत्वपूर्ण तकनीक 'मेल और फीमेल' (नर एवं मादा) पौधों का सही अनुपात में रोपण करना है।
"जैसे इंसानों और जीवों में नर व मादा होते हैं, ठीक वैसे ही परवल के पौधों में भी यह व्यवस्था होती है। अधिकांश किसानों को इसकी तकनीकी जानकारी नहीं होती, जिससे उन्हें सही उत्पादन नहीं मिलता और नुकसान उठाना पड़ता है। सही अनुपात में नर और मादा पौधे लगाने से पैदावार कई गुना बढ़ जाती है।"
— बृजनंदन महतो, प्रगतिशील किसान
उत्पादन, लागत और कमाई का पूरा गणित
परवल की खेती को बेहद किफायती और फायदे का सौदा बताते हुए बृजनंदन ने इसके आंकड़ों की जानकारी दी:
लागत: प्रति एकड़ सालाना औसतन केवल ₹20,000 का खर्च आता है।
उत्पादन क्षमता: एक एकड़ खेत से हर महीने लगभग 20 क्विंटल परवल का उत्पादन होता है।
बाजार मूल्य: मंडी में परवल का भाव ₹2,000 से ₹4,000 प्रति क्विंटल तक आसानी से मिल जाता है।
उत्पादन अवधि: परवल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसकी फसल एक बार लगाने के बाद लगातार 9 महीने तक फल देती है।
सह-फसली लाभ: खेत में खाली पड़ी जगहों पर वे अन्य मौसमी फसलें भी उगा लेते हैं, जिससे अतिरिक्त आय हो जाती है।
तमाम खर्च निकालने के बाद, वे सिर्फ परवल की खेती से सालभर में 5 से 6 लाख रुपये का शुद्ध लाभ अर्जित कर रहे हैं। फिलहाल उनके खेतों में परवल की उन्नत किस्म 'राजेंद्र-1' और 'राजेंद्र-2' लगी हुई है।
जैविक खाद से मिलती है फसल को असली चमक
रासायनिक उर्वरकों के दुष्प्रभावों पर बात करते हुए बृजनंदन ने अन्य किसानों को जैविक खाद अपनाने की सलाह दी। उन्होंने बताया:
रासायनिक खाद का नुकसान: रासायनिक खाद का असर तात्कालिक होता है। शुरुआत में फसल अच्छी दिखती है, लेकिन धीरे-धीरे परवल का आकार और रंग बिगड़ने लगता है। बाजार में ऐसे परवल की मांग घट जाती है और ग्राहक इसे खरीदने से कतराते हैं।
जैविक खाद का फायदा: गोबर और जैविक खाद के इस्तेमाल से परवल का प्राकृतिक रंग, चमक और आकार लंबे समय तक बरकरार रहता है। इससे मंडी में व्यापारी और ग्राहक दोनों ही बेहतर दाम देने को तैयार रहते हैं।
एग्री-बिजनेस की ओर कदम: बेटों को भी जोड़ रहे व्यापार से
खेती को किसी भी बड़े कॉर्पोरेट बिजनेस से बेहतर मानने वाले बृजनंदन महतो अब अपने परिवार को पूरी तरह से 'एग्री-बिजनेस' (कृषि व्यवसाय) में उतार रहे हैं। वे अपने बेटों को भी इसी क्षेत्र में आगे बढ़ा रहे हैं।
उन्होंने बताया कि बहुत जल्द वे पपीता और केले की बड़े पैमाने पर व्यावसायिक खेती और व्यापार की शुरुआत करने जा रहे हैं। इसके लिए तैयारियां अंतिम चरण में हैं। उनका मानना है कि सही सोच और मेहनत से खेती को यदि व्यापार का रूप दिया जाए, तो ग्रामीण युवाओं को रोजगार के लिए पलायन करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी
विशेष रिपोर्ट : विनय झा