
#पुण्य तिथि पर विशेष
#कुंवर प्रसून को नहीं मिला वह #सम्मान, #जिसके थे वे हक़दार
#अच्छे पत्रकार बहुत हुए हैं, और आगे भी होंगे. लेकिन कुंवर प्रसून जैसा शायद ही कोई होगा। एक ऐसा नाम, ऐसा व्यक्तित्व जिन्होंने अपने परिवार से ज्यादा समाज को प्राथमिकता दी अर्थात उन्होंने समाज को ही अपना परिवार माना और समाज के ही हितों के लिए कार्य करते रहे। नई पीढ़ी अर्थात जेन-जी उनके बारे में बहुत कम जानती है, लेकिन उनके बारे में समाज के लोग जितना भी जानते हैं, शायद कम ही जानते हैं। जितना कार्य उन्होंने समाज के लिए किया उस लिहाज से उनके काम को ठीक से आंका नहीं गया। जो सम्मान उन्हें मिलना चाहिए था, अर्थात जिसके वे हकदार थे वह भी उनको नहीं मिल पाया।
#कुंवर प्रसून अपने समय के पत्रकारिता जगत के चमकते हुए सितारे थे, जिनकी चमक से समाज में फैला अंधियारा दूर होता था। वैसे तो वे मूलरूप से पत्रकार और लेखक थे, लेकिन एक कुशल आंदोलनकारी, पर्यावरणविद्, राजनीतिक टिप्पणी कार और भी बहुत कुछ थे वे। विश्व प्रसिद्ध चिपको आंदोलन के जिन नारों की चर्चा आज भी होती है, वे सब कुंवर प्रसून की कलम से ही निकले थे। ऐसे कालजई नारे, जिनका तोड़ किसी के पास आज भी नहीं है। एक-एक शब्द बहुत ही सारगर्वित और संदेश देने वाला। उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान जब राज्य बनने के नफा नुकसान पर उनसे चर्चा होती थी तो उन्होंने उस समय जो कुछ कहा- आज वह सच साबित हो रहा है। वे गढ़वाली में बहुत अच्छी कहानियां भी लिखते थे। आकाशवाणी नजीबाबाद से जब उनकी कहानियों का प्रसारण होता था तो लोग बड़े चाव से उनकी कहानी सुनते थे।
#वे अच्छे गीतकार भी थे। प्रदेश में एनडी तिवारी सरकार के समय सरकार के कामकाज पर उन्होंने एक बाजूबंद भी लिखा था। जिससे प्रेरित होकर गढ़ रतन नरेंद्र सिंह नेगी ने नौछमी नारैण गीत की रचना की। नरेंद्र सिंह नेगी ने किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह बाद कही थी। बोफोर्स तोप घोटाले के समय उन्होंने बोफोर्स का मंडाण नाम से एक किताब लिखी। जो जागर पर आधारित थी और इसे पब्लिक में खूब सराहा गया। उन्हें हर विषय की बहुत ही व्यापक समझ थी। वे सिर्फ पेड़ पौधों का दर्द ही नहीं जानते थे, अपितु पहाड़, मिट्टी पानी की भी उन्हें गहरी समझ थी। उन्होंने अपने को पत्रकारिता, समाज सेवा, आंदोलनकारी आदि कई मोर्चे पर खरा साबित किया। पहाड़ के एक छोटे से गांव में रहकर उन्होंने देश दुनिया के विषयों पर अपनी समझ को बहुत तेजी से विकसित किया और कलम के द्वारा समाज के सामने उसको रखा।
#वे पत्रकार ही नहीं, बल्कि पहाड़ के एक ऐसे योद्धा थे, जिनसे माफिया डरते थे। जब उनकी कलम चलती थी तो माफिया कांपने लगते थे। उनका व्यक्तित्व बहुत ही विलक्षण था। उनके निधन के बाद शुरुआत के कुछ वर्षों तक उनके नजदीकी मित्रों व सामाजिक संगठनों ने खाड़ी, चंबा, नई टिहरी आदि स्थानों में कार्यक्रम आयोजित किए, लेकिन फिर यह क्रम टूट गया। सभी अपने निजी कार्यों में व्यस्त हो गए। अब देहरादून के साथी ही कुछेक सालों से उनकी स्मृति में कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं, जो की अच्छी पहल है। उनकी पुण्यतिथि के बजाय उनके जन्मदिन के मौके पर कार्यक्रमों का आयोजन हो तो ज्यादा बेहतर रहेगा। यह क्रम टूटना नहीं चाहिए। उन्होंने समाज के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया था, इसलिए समाज के लोगों की ही यह जिम्मेदारी बनती है कि उनके नाम को आगे बढ़ाया जाए, ताकि नई पीढ़ी उनके जीवन कर्म से कुछ प्रेरणा ले सके। आज के समय में पत्रकारिता के जो छात्र हैं, यदि वे कुंवर प्रसून के बारे में पढ़ेगे, जानेंगे तो वे निकट भविष्य में अच्छे पत्रकार बन सकते हैं। जीते जी न सही, लेकिन उन्हें मरणोपरांत पत्रकारिता का बड़ा सम्मान मिलना चाहिए।