हरेला पर हरियाली के गीत गाए जा रहे हैं...
और 7 मोड़ पर जंगल की आख़िरी साँसें गिनी जा रही हैं।
आज उत्तराखंड में कई लोगों ने काला हरेला मनाया। यह किसी पर्व का विरोध नहीं, बल्कि उस विडंबना के खिलाफ़ एक प्रतीकात्मक आवाज़ है, जहाँ एक तरफ़ पौधरोपण के उत्सव मनाए जा रहे हैं और दूसरी तरफ़ ऋषिकेश–देहरादून 7 मोड़ परियोजना के लिए सैकड़ों पेड़ काटे जा रहे हैं।
सवाल सड़क बनने का नहीं है, सवाल यह है कि क्या विकास का हर रास्ता जंगलों से होकर ही गुज़रेगा?
एक पौधा लगाना सराहनीय है, लेकिन एक परिपक्व पेड़ को खो देना सिर्फ़ एक तना खोना नहीं—वह पक्षियों का घर, वन्यजीवों का आश्रय, पहाड़ की ठंडी हवा और आने वाली पीढ़ियों की साँसें खो देना है।
आज काला हरेला उन कटते पेड़ों का मौन शोक है, जो बोल नहीं सकते।
और उन लोगों की आवाज़ है, जो चाहते हैं कि विकास हो—लेकिन प्रकृति की कीमत पर नहीं।
"हरेला तभी सार्थक होगा, जब पौधे लगाने के साथ-साथ खड़े पेड़ों को बचाने का संकल्प भी लिया जाएगा।"
Jakhnidhar, Tehri Garhwal | Jul 16, 2026