
गरीब को मोहरा बनाकर असली सरगना बचाने का खेल?
जिसे जेल भेजना था, उसे बचा लिया गया और जिस गरीब को चंद पैसों के लालच में मोहरा बनाया गया, उसी पर कार्रवाई कर पुलिस प्रशासन अब अपनी पीठ थपथपा रहा है।
अवैध गांजे के कारोबार के खिलाफ कार्रवाई निश्चित रूप से जरूरी है, लेकिन सवाल यह है कि कार्रवाई सिर्फ उस व्यक्ति तक क्यों सीमित रह गई, जो कथित तौर पर कुछ पैसों के लालच में गांजा बेचने का काम कर रहा था? आखिर वह गांजा उसके पास पहुंचा कैसे और इसके पीछे कौन लोग हैं?
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा लगातार सामने आती रही है कि कुछ कथित कारोबारी गरीब और जरूरतमंद लोगों को लालच देकर अपने अवैध कारोबार का हिस्सा बनाते हैं। पहले उन्हें पैसों का लालच दिया जाता है, फिर गांव या बाजार में दुकान खुलवाकर उनके माध्यम से नशीले पदार्थों की बिक्री कराई जाती है। जब पुलिस की कार्रवाई होती है तो सबसे पहले वही कमजोर व्यक्ति गिरफ्त में आता है, जबकि कथित तौर पर पूरे नेटवर्क को संचालित करने वाले बड़े चेहरे पर्दे के पीछे रह जाते हैं।
ऐसे में पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
क्या पुलिस ने यह पता लगाने की कोशिश की कि गांजा कहां से आया? किसने उपलब्ध कराया? पैसा किसे पहुंचता था? दुकान खुलवाने के पीछे किसका हाथ था? और इस पूरे नेटवर्क का असली सरगना कौन है?
अगर जांच सिर्फ एक छोटे विक्रेता की गिरफ्तारी तक सीमित रह जाती है तो इससे अवैध कारोबार पर स्थायी रोक नहीं लग सकती। गरीब व्यक्ति को जेल भेज देने से नेटवर्क खत्म नहीं होता। जरूरत है उस पूरी कड़ी तक पहुंचने की, जहां से नशे का कारोबार संचालित हो रहा है।
पुलिस प्रशासन को चाहिए कि वह छोटे विक्रेता की गिरफ्तारी को अंतिम सफलता मानने के बजाय पूरे नेटवर्क की जांच करे और कथित मुख्य संचालकों तक पहुंचे। तभी कार्रवाई को वास्तविक और प्रभावी कार्रवाई माना जाएगा।
क्योंकि सवाल सिर्फ एक गिरफ्तारी का नहीं है—
सवाल यह है कि असली खिलाड़ी कौन है और उसके खिलाफ कार्रवाई कब होगी?
अगर गरीब को मोहरा बनाकर बड़े कारोबारी बचते रहे, तो पुलिस की कार्रवाई पर उठने वाले सवाल कभी #up #Gorakhpur #गोरखपुर #UPNews @@खत्म नहीं होंगे।