
बिसाऊ। नगर पालिका चुनाव में मतदान खत्म होते ही अब बिसाऊ की सियासत में सबसे बड़ा सवाल जीत-हार से आगे निकलकर बोर्ड गठन पर आ गया है। 25 वार्डों वाली बिसाऊ नगर पालिका में बहुमत के लिए 13 पार्षदों की जरूरत होगी। ऐसे में अगर भाजपा और कांग्रेस दोनों इस जादुई आंकड़े से दूर रह जाती हैं, तो असली खेल उन पार्षदों का होगा जो किसी पार्टी के बैनर के बजाय निर्दलीय मैदान में उतरे हैं।
यानी तस्वीर साफ है—जिसके पास 13, उसकी सत्ता... और अगर 13 किसी के पास नहीं तो ‘किंगमेकर’ निर्दलीय!
🔥 समीकरण नंबर-1: भाजपा सबसे बड़ी पार्टी, लेकिन बहुमत से दूर
मान लीजिए भाजपा सबसे ज्यादा सीटें जीतती है, लेकिन उसके खाते में 10-12 सीटें ही आती हैं। ऐसे में कांग्रेस भी बहुमत से दूर रहती है तो भाजपा की नजर सीधे निर्दलीयों पर होगी।
कुछ निर्दलीय भाजपा के साथ आते हैं तो बोर्ड बनाने का रास्ता खुल सकता है। लेकिन यहां असली पेंच अध्यक्ष पद को लेकर फंस सकता है—क्योंकि समर्थन देने वाला हर पार्षद बदले में राजनीतिक हिस्सेदारी की उम्मीद रख सकता है।
🔥 समीकरण नंबर-2: कांग्रेस आगे निकली तो निर्दलीयों से बनेगी ‘सरकार’
अगर कांग्रेस 10-12 सीटों के आसपास पहुंचती है और भाजपा भी बहुमत से नीचे रहती है, तो कांग्रेस के लिए निर्दलीय पार्षद सबसे बड़ा सहारा बन सकते हैं।
ऐसी स्थिति में चुनाव से पहले एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हुए प्रत्याशी चुनाव के बाद एक ही बोर्ड के समर्थन में नजर आएं, तो बिसाऊ की राजनीति में यह सबसे दिलचस्प तस्वीर होगी।
🔥 समीकरण नंबर-3: भाजपा-कांग्रेस दोनों बराबरी पर!
सबसे रोमांचक स्थिति तब बन सकती है, जब भाजपा और कांग्रेस लगभग बराबर सीटों पर अटक जाएं और कुछ निर्दलीय जीतकर सदन में पहुंच जाएं।
यही वह स्थिति होगी, जब एक-दो निर्दलीय पार्षद भी पूरे बोर्ड का गणित बदल सकते हैं।
👀 सबसे ज्यादा नजर निर्दलीयों पर क्यों?
बिसाऊ में चुनावी मैदान में निर्दलीय प्रत्याशियों की मौजूदगी पहले से ही मुकाबले को रोचक बनाती रही है। नामांकन के दौरान भी कई वार्डों में भाजपा-कांग्रेस के साथ निर्दलीय प्रत्याशियों ने ताल ठोकी थी।
अब मतदान के बाद प्रत्याशियों के समर्थक अपने-अपने आंकड़े जोड़ रहे हैं। कहीं जीत का दावा है तो कहीं मुकाबला कांटे का बताया जा रहा है। लेकिन ईवीएम खुलने से पहले किसी भी खेमे को बहुमत का मालिक मानना जल्दबाजी होगी।
🎯 असली खेल 14 सितंबर को!
14 सितंबर को मतगणना के बाद जब वार्ड-दर-वार्ड तस्वीर साफ होगी, तभी पता चलेगा कि बिसाऊ में किसके सिर जीत का सेहरा बंधता है और किसे बोर्ड बनाने के लिए दूसरे खेमे का दरवाजा खटखटाना पड़ेगा।
और अगर दोनों बड़े दल बहुमत से दूर रहे तो बिसाऊ की राजनीति में एक बात तय मानी जा सकती है—
“चुनाव जनता ने लड़ा है... लेकिन बोर्ड बनाने का खेल निर्दलीय तय कर सकते हैं!”
अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि कौन जीतेगा?
सवाल यह है—जीतने के बाद किसके साथ जाएगा?
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Churu, Churu | Sep 11, 2026