🔳सफलता की कहानी
🔳आधा एकड़ के प्रयोग से 5 एकड़ की उड़ान
🔳चिया ने संदीप तिवारी के लिए खोली मुनाफे की राह
🔳प्राकृतिक खेती और वैज्ञानिक तकनीक बनी बदलाव की ताकत
🔳कटनी- खेत वही था, मेहनत वही थी और किसान भी वही। लेकिन खेती का तरीका बदला तो परिणाम भी बदल गए। ग्राम चरगवां, तहसील स्लीमनाबाद के कृषक संदीप तिवारी ने परंपरागत खेती से आगे बढ़कर जब चिया जैसी नई फसल का प्रयोग किया, तो आधा एकड़ में शुरू हुआ यह छोटा-सा प्रयास आज 5 एकड़ की खेती तक पहुंच चुका है। संदीप की कहानी बताती है कि खेती में बदलाव केवल फसल बदलने से नहीं, बल्कि सोच, तकनीक और सही मार्गदर्शन को अपनाने से आता है। आत्मा योजना के तकनीकी मार्गदर्शन और प्राकृतिक कृषि पद्धति ने उनके खेत को प्रयोगशाला में बदला और इसी प्रयोग ने खेती को अधिक लाभकारी बनाने की नई राह दिखाई।
*बढ़ती लागत के बीच तलाश रहे थे नई राह*
कई वर्षों से संदीप तिवारी खरीफ में धान और रबी में गेहूं की परंपरागत खेती करते थे। खेती के साथ अनुभव बढ़ रहा था, लेकिन लागत भी लगातार बढ़ती जा रही थी। बीज, सिंचाई, उर्वरक और कीटनाशकों पर बढ़ते खर्च के बावजूद उत्पादन में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो रही थी। रासायनिक खेती के लगातार इस्तेमाल का असर भूमि की गुणवत्ता पर भी दिखाई देने लगा। ऐसे में संदीप के सामने सवाल था—क्या खेती को कम लागत में अधिक लाभ का व्यवसाय बनाया जा सकता है? इसी सवाल ने उन्हें नए प्रयोग की ओर बढ़ाया।
*आत्मा योजना से मिला तकनीक का साथ*
आत्मा योजना के अमले ने उन्हें चिया की खेती और प्राकृतिक कृषि पद्धति की जानकारी दी। केवल जानकारी ही नहीं, बल्कि जीवामृत और बीजामृत तैयार करने तथा उनके उपयोग का व्यावहारिक प्रदर्शन भी कराया गया। संदीप ने इस मार्गदर्शन को अपनाया और खेती में बदलाव की शुरुआत की। उन्होंने तय किया कि नई तकनीक को पहले छोटे क्षेत्र में आजमाया जाए और परिणाम अच्छे रहे तो आगे इसे बड़े क्षेत्र में विस्तार दिया जाए।
*आधा एकड़ में बोया भरोसे का बीज*
वर्ष 2024-25 में आत्मा योजना के तहत संदीप को प्रदर्शन के लिए आधा एकड़ क्षेत्र में चिया का बीज उपलब्ध कराया गया। बीज उपचार के बाद बोनी की गई और फसल की जरूरत के अनुसार सिंचाई की गई। जब खेत में चिया की फसल तैयार हुई तो संदीप के लिए यह सिर्फ एक नई फसल नहीं थी, बल्कि एक नए विश्वास की शुरुआत थी। कम लागत में बेहतर परिणाम ने उनके मन में यह भरोसा पैदा किया कि परंपरागत फसलों के साथ नई और लाभकारी फसलों को अपनाकर खेती की आमदनी बढ़ाई जा सकती है।
*नई सोच का असर धान की खेती में भी दिखा*
संदीप ने चिया के साथ धान की खेती में भी वैज्ञानिक पद्धति अपनाई। आत्मा योजना के मार्गदर्शन में उन्नत किस्म का बीज लेकर पौध तैयार की गई। लगभग 15 दिन की पौध की निर्धारित दूरी पर रोपाई की गई और फसल में वर्मी कम्पोस्ट का उपयोग किया गया। तकनीक और बेहतर प्रबंधन का परिणाम उत्पादन में दिखाई दिया। पिछले खरीफ की तुलना में इस वर्ष धान का उत्पादन बढ़ा और संदीप को 61 हजार 200 रुपये का शुद्ध लाभ प्राप्त हुआ।
*रबी में चिया ने फिर दिया मुनाफे का भरोसा*
रबी सीजन में गेहूं के साथ चिया की खेती ने संदीप के अनुभव को और मजबूत किया। तकनीकी मार्गदर्शन के अनुसार खेती करने से उन्हें बेहतर परिणाम मिले और 51 हजार रुपये का शुद्ध मुनाफा प्राप्त हुआ। संदीप के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि चिया ने उन्हें कम लागत में आर्थिक लाभ का ऐसा विकल्प दिया, जिसे वे अपनी खेती में आगे बढ़ा सकते थे।
*अब आधा एकड़ नहीं, 5 एकड़ में चिया*
एक समय आधा एकड़ में प्रयोग के तौर पर बोई गई चिया अब संदीप की खेती का बड़ा हिस्सा बन चुकी है। बेहतर परिणामों से उत्साहित संदीप वर्ष 2026 में लगभग 5 एकड़ क्षेत्र में चिया की खेती कर रहे हैं। यह विस्तार केवल क्षेत्रफल का बढ़ना नहीं है, बल्कि उस भरोसे का प्रमाण है जो एक किसान ने अपने प्रयोग के परिणाम देखकर हासिल किया है।
*गांव तक पहुंचाने का संकल्प*
संदीप तिवारी की सोच अब अपने खेत की सीमा से आगे निकल चुकी है। उनका लक्ष्य है कि आने वाले वर्ष में 50 से 100 किसानों को चिया की खेती के लिए प्रेरित किया जाए, ताकि अन्य किसान भी कम लागत में बेहतर आय के विकल्प तलाश सकें। उनका मानना है कि प्राकृतिक खेती और वैज्ञानिक तकनीकों का समन्वय खेती को अधिक टिकाऊ और लाभकारी बना सकता है। किसान यदि नई फसलों, उन्नत तकनीक और विशेषज्ञ मार्गदर्शन को अपनाएं, तो खेती को केवल आजीविका नहीं बल्कि आय का मजबूत और टिकाऊ माध्यम बनाया जा सकता है।संदीप के खेत से निकली उम्मीद की एक नई फसल चरगवां के खेतों में लहलहाती चिया अब केवल एक फसल नहीं है। यह नई सोच, कम लागत, तकनीकी मार्गदर्शन और आत्मनिर्भर खेती की उम्मीद का प्रतीक बन रही है।
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Katni, Madhya Pradesh | Sep 14, 2026