डेरी गड़ाई विधान | बस्तर दशहरा
### सिरहासार भवन, जगदलपुर | बस्तर, छत्तीसगढ़
बस्तर दशहरा की दूसरी प्रमुख रस्म — डेरी गड़ाई
डेरी गड़ाई बस्तर के विश्वप्रसिद्ध दशहरा पर्व की दूसरी प्रमुख रस्मों में से एक है। यह विधान जगदलपुर स्थित सिरहासार भवन में संपन्न किया जाता है और इसके साथ ही बस्तर दशहरा के विशाल रथ के निर्माण की प्रक्रिया का औपचारिक शुभारंभ माना जाता है।
यह रस्म बस्तर की सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं, राजपरिवार की भूमिका, स्थानीय पुजारी समुदाय और ग्रामीणों की पारंपरिक सहभागिता को दर्शाती है।
1\. साल की लकड़ी का आगमन
डेरी गड़ाई के लिए बस्तर के बिरिंगपाल क्षेत्र से शाखायुक्त सरई (साल) की लकड़ी लाई जाती है। ग्रामीणों द्वारा लाई गई इस लकड़ी को धार्मिक विधान के लिए तैयार किया जाता है।
साल का पेड़ बस्तर के वनांचल और स्थानीय जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस रस्म में लकड़ी का चयन और उसकी स्थापना परंपरा के अनुसार किया जाता है।
2\. पूजा एवं डेरी की स्थापना
सिरहासार भवन में दो स्तंभों के बीच जमीन में गड्ढे तैयार किए जाते हैं। परंपरागत विवरणों के अनुसार, गड्ढे में अंडा, मोंगरी मछली और लाई जैसी सामग्री रखी जाती है।
इसके बाद लगभग 10 फीट लंबी साल की लकड़ी पर हल्दी का लेप लगाया जाता है और उसे विधि-विधान के साथ जमीन में खड़ा किया जाता है। इस लकड़ी की स्थापना को डेरी गड़ाई कहा जाता है।
पूजा में प्रधान पुजारी, मांझी, चालकी और बस्तर दशहरा समिति से जुड़े सदस्य उपस्थित रहते हैं। राजघराने से संबंधित सामग्री भी इस परंपरा का हिस्सा बताई जाती है।
3\. रथ निर्माण का शुभारंभ
डेरी गड़ाई के पूरा होने के बाद बस्तर दशहरा के रथ निर्माण के लिए जंगलों से लकड़ी लाने की प्रक्रिया शुरू होती है।
परंपरागत विवरणों के अनुसार:
* साल की लकड़ी: रथ के मुख्य निर्माण में उपयोग की जाती है।
* तिनसा प्रजाति की लकड़ी: रथ के पहियों के एक्सल सहित कुछ निर्माण कार्यों में उपयोग होती है।
* रथ निर्माणकर्ता: झाड़ उमरगांव और बेड़ा उमरगांव के ग्रामीण पारंपरिक तकनीकों और औजारों से रथ का निर्माण करते हैं।
यह प्रक्रिया बस्तर की सामुदायिक कारीगरी, पारंपरिक ज्ञान और धार्मिक आयोजन के बीच संबंध को सामने लाती है।
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डेरी गड़ाई के माध्यम से:
* दशहरा पर्व की अगली महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं का आरंभ होता है।
* पारंपरिक पूजा-पद्धति और सामुदायिक सहभागिता कायम रहती है।
* रथ निर्माण से जुड़ी पीढ़ियों पुरानी कारीगरी आगे बढ़ती है।
* बस्तर की सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक परंपराओं का प्रदर्शन होता है।