*शासकीय महारानी लक्ष्मीबाई कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय में हिंदी पखवाड़ा के अंतर्गत व्याख्यान का हुआ आयोजन*
इंदौर, 25 सितम्बर 2026
शासकीय महारानी लक्ष्मीबाई कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय किला भवन इंदौर में हिंदी पखवाड़ा के अंतर्गत हिंदी भाषा, साहित्य एवं भारतीय ज्ञान परंपरा के महत्व पर विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य छात्राओं में हिंदी भाषा के प्रति रुचि, गौरव एवं रचनात्मक अभिव्यक्ति की भावना विकसित करना तथा हिंदी के व्यापक स्वरूप से परिचित कराना रहा। कार्यक्रम का आयोजन महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. बी. डी. श्रीवास्तव के संरक्षण एवं प्रशासनिक अधिकारी डॉ. वी. पी. बैरागी के मार्गदर्शन एवं हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. नीरज चौहान के निर्देशन में किया गया। कार्यक्रम में हिंदी भाषा की समृद्ध परंपरा, उसके साहित्यिक एवं सांस्कृतिक महत्व तथा वर्तमान समय में हिंदी की उपयोगिता पर विस्तार से प्रकाश डाला।
कार्यक्रम में महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. बी. डी. श्रीवास्तव ने अपने आशीर्वचन प्रदान करते हुए कहा कि “देश की ताकत नौजवान हैं और देश की शोहरत भी नौजवानों से है।” उन्होंने कहा कि आज भाषा की सीमाएँ तेजी से समाप्त हो रही हैं और इंटरनेट क्रांति ने संचार को वैश्विक स्वरूप प्रदान कर दिया है। आज भाषा एक प्रकार से यूनिवर्सल हो गई है। इंटरनेट और तकनीक ने विभिन्न भाषाओं एवं संस्कृतियों के बीच संवाद को सहज बना दिया है। उन्होंने छात्राओं को अपनी मूल भाषा के प्रयोग के लिए प्रेरित करते हुए कहा कि हमें अपनी भाषा में सहज होकर संवाद करना चाहिए। यदि हम अपनी मूल भाषा में बात करते हैं तो तकनीक के माध्यम से सामने वाला व्यक्ति भी अपनी मूल भाषा में हमारी बात समझ सकता है। इस प्रकार भाषा अब संवाद में बाधा नहीं, बल्कि आपसी जुड़ाव का माध्यम बन रही है। प्राचार्य ने आधुनिक तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की बढ़ती संभावनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि आज तकनीक इतनी विकसित हो रही है कि मनुष्य के विचारों और मस्तिष्क में चल रही गतिविधियों को समझने तथा उन्हें तकनीकी रूप देने की दिशा में भी कार्य हो रहा है। ऐसे समय में हमें तकनीक के प्रति अधिक सजग, जिम्मेदार और विवेकशील होने की आवश्यकता है। उन्होंने साहित्य और सिनेमा के उदाहरणों के माध्यम से कहा कि हमारे समय में प्रेम, संबंध और भावनाओं की अभिव्यक्ति के तरीके भी बदल रहे हैं। भारतीय साहित्य में मीरा जैसी भक्त कवयित्री ने भी अपने आराध्य के प्रति पूर्ण समर्पण की भावना व्यक्त करते हुए कहा—“जो कुछ हो तुम ही हो।” आज आवश्यकता इस बात की है कि हम त्वरित प्रतिक्रियाओं के दौर में अपनी स्वतंत्र सोच, संवेदनशीलता और विवेक को बनाए रखें। प्राचार्य डॉ. श्रीवास्तव ने छात्राओं का आह्वान करते हुए कहा कि भाषा और तकनीक दोनों का सकारात्मक एवं रचनात्मक प्रयोग करते हुए अपने भविष्य का निर्माण करें। तकनीक हमारे लिए साधन है, इसलिए उसका उपयोग ज्ञान, सृजन, सेवा और राष्ट्र निर्माण के लिए किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि युवा शक्ति यदि अपनी ऊर्जा को सही दिशा में लगाए तो वह स्वयं के साथ-साथ समाज और राष्ट्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. नीरज चौहान ने मुख्य वक्ता डॉ. पुष्पेंद्र दुबे सर का परिचय देते हुए उन्हें व्याख्यान के लिए आमंत्रित किया। मुख्य वक्ता डॉ. पुष्पेंद्र दुबे ने बताया कि समाज में व्याप्त विभिन्न समस्याओं और चुनौतियों से निपटने के उद्देश्य से सेवा ग्राम में बैठक आयोजित की गई, जिसमें विभिन्न भाषाओं के विद्वान एवं प्राध्यापक शामिल हुए। इस दौरान यह अनुभव सामने आया कि देश की विविध भाषाओं के कारण आपसी संवाद में कठिनाई आती है। भाषा की इस समस्या को राष्ट्रीय स्तर पर महसूस किया गया और इसे दूर करने के लिए हिंदी को संपर्क भाषा के रूप में विकसित करने की दिशा में प्रयास किए गए। डॉ. दुबे ने इंदौर के हिंदी भाषा एवं साहित्य के विकास में योगदान का उल्लेख करते हुए बताया कि वर्ष 1910 में सरयू प्रसाद जी ने इंदौर में एक पुस्तकालय स्थापित करने का विचार देखा था। इसके बाद वर्ष 1918 में महात्मा गांधी के इंदौर आगमन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग की पहल पर इंदौर में अधिवेशन आयोजित करने और गांधीजी को आमंत्रित करने का प्रयास किया गया। उन्होंने इंदौर के उद्योगपति सर सेठ हुकुमचंद द्वारा गांधीजी के सम्मान में आयोजित भोज का प्रसंग भी सुनाया। उन्होंने महात्मा गांधी के हिंदी के प्रति विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि गांधीजी हिंदी को देश को जोड़ने वाली भाषा के रूप में देखते थे। दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए कार्यकर्ताओं को भेजा गया और हिंदी के माध्यम से उत्तर से दक्षिण भारत को जोड़ने का प्रयास किया गया। उन्होंने कहा कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि देश की विविधताओं को जोड़ने वाली महत्वपूर्ण कड़ी भी है। डॉ. दुबे ने कहा कि इंदौर ने हिंदी और तकनीक के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। हिंदी के पहले वेब पोर्टल के निर्माण का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि मालवा क्षेत्र की हिंदी को अपनी विशिष्टता और उत्कृष्टता के लिए जाना जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि आने वाले समय में अनुवाद के क्षेत्र में भाषा विशेषज्ञों की आवश्यकता लगातार बनी रहेगी। भौगोलिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विविधताओं को समझने तथा विभिन्न भाषाओं के बीच संवाद स्थापित करने में भाषाविदों की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता भाषा को रोजगार और कौशल से जोड़ने की है। नई शिक्षा नीति में भी विद्यार्थियों के ज्ञान, कौशल और रोजगारोन्मुखी शिक्षा पर विशेष बल दिया गया है। स्वामी विवेकानंद के शिकागो धर्म संसद में दिए गए संदेश का उल्लेख करते हुए उन्होंने भारतीय संस्कृति की व्यापकता और मानवता के प्रति उसके दृष्टिकोण को रेखांकित किया। उन्होंने छात्राओं की क्षमता पर विश्वास व्यक्त करते हुए कहा कि भारतीय महिलाओं ने सदैव ज्ञान, संस्कृति और समाज निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज आवश्यकता है कि बेटियाँ शिक्षा, ज्ञान, सेवा और नेतृत्व के क्षेत्र में आगे बढ़ें और समाज को नई दिशा दें।
कार्यक्रम में आयोजित व्याख्यान में हिंदी को केवल संप्रेषण का माध्यम न मानते हुए भारतीय संस्कृति, लोकजीवन, ज्ञान-विज्ञान एवं सामाजिक मूल्यों को अभिव्यक्त करने वाली सशक्त भाषा के रूप में रेखांकित किया गया। वक्ता ने छात्राओं को हिंदी के अधिकाधिक प्रयोग के लिए प्रेरित करते हुए कहा कि भाषा का विकास उसके निरंतर प्रयोग, अध्ययन और सृजन से होता है। डिजिटल युग में हिंदी के बढ़ते प्रयोग तथा तकनीकी क्षेत्र में हिंदी की संभावनाओं पर भी चर्चा की गई। कार्यक्रम में महाविद्यालय की वरिष्ठ प्राध्यापक प्रो. निशा जैन, आई.क्यू.ए.सी. प्रभारी प्रो. मनीषा जोशी, हिंदी विभाग से प्रो. संतोष एस्के, प्रो. नेहा गुप्ता, प्रो. विजयता पंडित, भारतीय ज्ञान परंपरा सदस्य प्रो. योगिता मांडलिक, प्रो. अंजना चौरसिया, प्रो. संध्या दावरे सहित अन्य प्राध्यापकगण, कर्मचारी एवं बड़ी संख्या में छात्राएँ उपस्थित रहीं।
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31 views | Indore, Madhya Pradesh | Sep 26, 2026