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एचपीयू में सहायक प्रोफेसर भर्ती पर एसएफआई का बड़ा आरोप, नियुक्ति रद्द करने और न्यायिक जांच की मांग शिमला, 3 जुलाई। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय (एचपीयू) में सहायक प्रोफेसर (कॉमर्स) की भर्ती को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) की विश्वविद्यालय इकाई ने कुलपति को कुलसचिव के माध्यम से विस्तृत शिकायत-पत्र सौंपते हुए आरोप लगाया है कि विज्ञापन संख्या Rectt.17/2019 के तहत डिपार्टमेंट ऑफ इवनिंग स्टडीज़ में हुई नियुक्ति विश्वविद्यालय के नियमों, विभागीय निर्णयों और वैधानिक प्रावधानों के विपरीत की गई। संगठन ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच, नियुक्ति रद्द करने, दोषी अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने तथा तत्कालीन कुलपति की भूमिका की न्यायिक जांच की मांग की है। एसएफआई के अनुसार 30 दिसंबर 2019 को जारी विज्ञापन के तहत सहायक प्रोफेसर (कॉमर्स) के चार पदों के लिए आवेदन मांगे गए थे। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि एससी (ओपन) श्रेणी के एक अभ्यर्थी ने 24 जनवरी 2020 को ऑनलाइन आवेदन किया, जबकि उसकी हार्ड कॉपी विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड के अनुसार 26 फरवरी 2020 को प्राप्त हुई। जबकि विज्ञापन में स्पष्ट रूप से 15 फरवरी 2020 तक आवेदन की हार्ड कॉपी जमा करना अनिवार्य था। संगठन ने सवाल उठाया है कि अंतिम तिथि के बाद प्राप्त आवेदन को किस अधिकारी के आदेश पर स्वीकार किया गया और उसे भर्ती प्रक्रिया में शामिल कैसे किया गया। एसएफआई ने यह भी आरोप लगाया है कि आवेदन की अंतिम तिथि तक संबंधित अभ्यर्थी के पास कॉमर्स विषय में अनिवार्य एम.कॉम. की डिग्री नहीं थी और वह उस समय इग्नू से एम.कॉम. की पढ़ाई कर रहा था। संगठन का कहना है कि उसके पास एमबीए और पीएचडी की उपाधियां जरूर थीं, लेकिन विज्ञापित पद के लिए आवश्यक विषयगत योग्यता उपलब्ध नहीं थी। ऐसे में उसे पात्र घोषित करना भर्ती प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। शिकायत में कहा गया है कि 6 अक्टूबर 2020 को एचपीयू बिजनेस स्कूल की अकादमिक समिति ने निर्णय लिया था कि प्रबंधन विषय के शिक्षण पदों के लिए केवल मैनेजमेंट ग्रेजुएट्स और डॉक्टरेट ही पात्र होंगे तथा किसी अन्य विषय को मैनेजमेंट का एलाइड सब्जेक्ट नहीं माना जाएगा। इसके बाद 4 नवंबर 2020 को वाणिज्य विभाग की विभागीय परिषद ने भी सर्वसम्मति से निर्णय लिया कि कॉमर्स का कोई एलाइड सब्जेक्ट नहीं है। एसएफआई का आरोप है कि इन आधिकारिक निर्णयों के बावजूद भर्ती प्रक्रिया में एमबीए को कॉमर्स का एलाइड सब्जेक्ट मानते हुए संबंधित अभ्यर्थी को पात्र घोषित किया गया। संगठन ने यह भी आरोप लगाया कि 17 से 21 जून 2021 के बीच साक्षात्कार आयोजित किए गए और 21 जून 2021 को तत्कालीन कुलपति ने नियुक्ति आदेश जारी कर दिया। एसएफआई का कहना है कि हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय अधिनियम, 1970 की धारा 11(आई) के अनुसार शिक्षकों की नियुक्ति का अधिकार एग्जीक्यूटिव काउंसिल में निहित है, जबकि धारा 12-सी(7) के तहत कुलपति अपनी आपातकालीन शक्तियों का उपयोग नियुक्ति के लिए नहीं कर सकते। इसलिए तत्कालीन कुलपति की भूमिका की स्वतंत्र न्यायिक जांच कर जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। एसएफआई ने यह भी उल्लेख किया कि 16 जुलाई 2022 को, यानी नियुक्ति प्रक्रिया पूरी होने के लगभग एक वर्ष बाद, विश्वविद्यालय ने मैनेजमेंट और कॉमर्स को एलाइड सब्जेक्ट घोषित करने की अधिसूचना जारी की थी। संगठन का कहना है कि नियुक्ति के समय ऐसी कोई अधिसूचना प्रभावी नहीं थी। बाद में 26 जून 2023 को उच्च न्यायालय के आदेश के अनुपालन में इस अधिसूचना को वापस भी ले लिया गया। संगठन ने मांग की है कि संबंधित नियुक्ति तत्काल प्रभाव से निरस्त की जाए, पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कर दोषी अधिकारियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता, 2023 के तहत एफआईआर दर्ज की जाए, अंतिम तिथि के बाद आवेदन स्वीकार करने वाले अधिकारी की पहचान सार्वजनिक की जाए, पात्रता तय करने में विभागीय निर्णयों की अनदेखी करने वालों पर कार्रवाई हो तथा तत्कालीन कुलपति की भूमिका की न्यायिक जांच कर आवश्यक कानूनी कदम उठाए जाएं। साथ ही विश्वविद्यालय में कथित अनियमितताओं का आर्थिक बोझ छात्रों पर न डालते हुए हाल ही में बढ़ाई गई फीस भी वापस लेने की मांग की गई है। एसएफआई ने चेतावनी दी है कि यदि विश्वविद्यालय प्रशासन इस शिकायत पर समयबद्ध, निष्पक्ष और पारदर्शी कार्रवाई नहीं करता, तो संगठन छात्र समुदाय के साथ व्यापक लोकतांत्रिक आंदोलन शुरू करेगा और पूरे मामले को राज्य सरकार, राज्य सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो सहित अन्य सक्षम संस्थाओं के समक्ष भी उठाएगा।

Himachal Pradesh, India | Jul 3, 2026

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एचपीयू में सहायक प्रोफेसर भर्ती पर एसएफआई का बड़ा आरोप, नियुक्ति रद्द करने और न्यायिक जांच की मांग शिमला, 3 जुलाई। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय (एचपीयू) में सहायक प्रोफेसर (कॉमर्स) की भर्ती को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) की विश्वविद्यालय इकाई ने कुलपति को कुलसचिव के माध्यम से विस्तृत शिकायत-पत्र सौंपते हुए आरोप लगाया है कि विज्ञापन संख्या Rectt.17/2019 के तहत डिपार्टमेंट ऑफ इवनिंग स्टडीज़ में हुई नियुक्ति विश्वविद्यालय के नियमों, विभागीय निर्णयों और वैधानिक प्रावधानों के विपरीत की गई। संगठन ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच, नियुक्ति रद्द करने, दोषी अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने तथा तत्कालीन कुलपति की भूमिका की न्यायिक जांच की मांग की है। एसएफआई के अनुसार 30 दिसंबर 2019 को जारी विज्ञापन के तहत सहायक प्रोफेसर (कॉमर्स) के चार पदों के लिए आवेदन मांगे गए थे। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि एससी (ओपन) श्रेणी के एक अभ्यर्थी ने 24 जनवरी 2020 को ऑनलाइन आवेदन किया, जबकि उसकी हार्ड कॉपी विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड के अनुसार 26 फरवरी 2020 को प्राप्त हुई। जबकि विज्ञापन में स्पष्ट रूप से 15 फरवरी 2020 तक आवेदन की हार्ड कॉपी जमा करना अनिवार्य था। संगठन ने सवाल उठाया है कि अंतिम तिथि के बाद प्राप्त आवेदन को किस अधिकारी के आदेश पर स्वीकार किया गया और उसे भर्ती प्रक्रिया में शामिल कैसे किया गया। एसएफआई ने यह भी आरोप लगाया है कि आवेदन की अंतिम तिथि तक संबंधित अभ्यर्थी के पास कॉमर्स विषय में अनिवार्य एम.कॉम. की डिग्री नहीं थी और वह उस समय इग्नू से एम.कॉम. की पढ़ाई कर रहा था। संगठन का कहना है कि उसके पास एमबीए और पीएचडी की उपाधियां जरूर थीं, लेकिन विज्ञापित पद के लिए आवश्यक विषयगत योग्यता उपलब्ध नहीं थी। ऐसे में उसे पात्र घोषित करना भर्ती प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। शिकायत में कहा गया है कि 6 अक्टूबर 2020 को एचपीयू बिजनेस स्कूल की अकादमिक समिति ने निर्णय लिया था कि प्रबंधन विषय के शिक्षण पदों के लिए केवल मैनेजमेंट ग्रेजुएट्स और डॉक्टरेट ही पात्र होंगे तथा किसी अन्य विषय को मैनेजमेंट का एलाइड सब्जेक्ट नहीं माना जाएगा। इसके बाद 4 नवंबर 2020 को वाणिज्य विभाग की विभागीय परिषद ने भी सर्वसम्मति से निर्णय लिया कि कॉमर्स का कोई एलाइड सब्जेक्ट नहीं है। एसएफआई का आरोप है कि इन आधिकारिक निर्णयों के बावजूद भर्ती प्रक्रिया में एमबीए को कॉमर्स का एलाइड सब्जेक्ट मानते हुए संबंधित अभ्यर्थी को पात्र घोषित किया गया। संगठन ने यह भी आरोप लगाया कि 17 से 21 जून 2021 के बीच साक्षात्कार आयोजित किए गए और 21 जून 2021 को तत्कालीन कुलपति ने नियुक्ति आदेश जारी कर दिया। एसएफआई का कहना है कि हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय अधिनियम, 1970 की धारा 11(आई) के अनुसार शिक्षकों की नियुक्ति का अधिकार एग्जीक्यूटिव काउंसिल में निहित है, जबकि धारा 12-सी(7) के तहत कुलपति अपनी आपातकालीन शक्तियों का उपयोग नियुक्ति के लिए नहीं कर सकते। इसलिए तत्कालीन कुलपति की भूमिका की स्वतंत्र न्यायिक जांच कर जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। एसएफआई ने यह भी उल्लेख किया कि 16 जुलाई 2022 को, यानी नियुक्ति प्रक्रिया पूरी होने के लगभग एक वर्ष बाद, विश्वविद्यालय ने मैनेजमेंट और कॉमर्स को एलाइड सब्जेक्ट घोषित करने की अधिसूचना जारी की थी। संगठन का कहना है कि नियुक्ति के समय ऐसी कोई अधिसूचना प्रभावी नहीं थी। बाद में 26 जून 2023 को उच्च न्यायालय के आदेश के अनुपालन में इस अधिसूचना को वापस भी ले लिया गया। संगठन ने मांग की है कि संबंधित नियुक्ति तत्काल प्रभाव से निरस्त की जाए, पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कर दोषी अधिकारियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता, 2023 के तहत एफआईआर दर्ज की जाए, अंतिम तिथि के बाद आवेदन स्वीकार करने वाले अधिकारी की पहचान सार्वजनिक की जाए, पात्रता तय करने में विभागीय निर्णयों की अनदेखी करने वालों पर कार्रवाई हो तथा तत्कालीन कुलपति की भूमिका की न्यायिक जांच कर आवश्यक कानूनी कदम उठाए जाएं। साथ ही विश्वविद्यालय में कथित अनियमितताओं का आर्थिक बोझ छात्रों पर न डालते हुए हाल ही में बढ़ाई गई फीस भी वापस लेने की मांग की गई है। एसएफआई ने चेतावनी दी है कि यदि विश्वविद्यालय प्रशासन इस शिकायत पर समयबद्ध, निष्पक्ष और पारदर्शी कार्रवाई नहीं करता, तो संगठन छात्र समुदाय के साथ व्यापक लोकतांत्रिक आंदोलन शुरू करेगा और पूरे मामले को राज्य सरकार, राज्य सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो सहित अन्य सक्षम संस्थाओं के समक्ष भी उठाएगा। - Himachal Pradesh News