मऊ पावर ग्रिड में करंट का कहर: राधेश्याम की
मौ/त, बिजली विभाग से बड़ा सवाल—जान जाएगी तो जिम्मेदार कौन?
गया/टिकारी। मऊ पावर ग्रिड में बिजली फॉल्ट ठीक करने के दौरान करंट की चपेट में आकर लाइनमैन राधेश्याम कुमार की मौ/त ने बिजली विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक परिवार का कमाऊ सदस्य चला गया, लेकिन सवाल यह है कि आखिर उसकी मौ/त की जिम्मेदारी कौन लेगा?
बारिश हो या भीषण गर्मी—बिजली के काम में जोखिम हर मौसम रहता है। फिर सवाल उठता है कि लाइन पर काम करने वाले कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए विभाग की तैयारी कितनी गंभीर है? क्या शटडाउन की प्रक्रिया, सुरक्षा उपकरण और मौके पर अधिकारियों की निगरानी सिर्फ कागजों तक सीमित है?
सबसे बड़ा सवाल विभाग के एसडीओ और जिम्मेदार अधिकारियों से है—जब किसी कर्मचारी की जान खतरे में हो तो अधिकारी घटनास्थल तक पहुंचने में क्यों पीछे रहते हैं? अगर विभागीय व्यवस्था में कहीं लापरवाही हुई है तो उसकी जवाबदेही तय क्यों नहीं होनी चाहिए?
क्या बिजली विभाग के लिए एक लाइनमैन की जिंदगी की कीमत सिर्फ एक मुआवजे की फाइल है?
राधेश्याम की मौ/त के बाद उसका परिवार कैसे चलेगा? जिस घर का पति चला गया, जिस मां-बाप का बेटा चला गया या जिस परिवार की रोजी-रोटी उसी कमाने वाले सदस्य से जुड़ी थी—उस परिवार की जिम्मेदारी कौन उठाएगा?
बिजली उपभोक्ताओं से बिल की वसूली में विभाग पूरी तत्परता दिखाता है, लेकिन अपने कर्मचारियों की सुरक्षा और हादसे के बाद परिवार के साथ खड़े होने में वही तत्परता क्यों नहीं दिखती?
सीधे सवाल
- राधेश्याम को काम पर भेजने से पहले सुरक्षा मानकों का पालन हुआ था या नहीं?
- लाइन पर काम के दौरान शटडाउन और सुरक्षा प्रोटोकॉल की निगरानी किस अधिकारी की जिम्मेदारी थी?
- हादसे की सूचना के बाद संबंधित अधिकारी घटनास्थल पर कब पहुंचे?
- मृतक के परिवार को विभाग की ओर से कितनी आर्थिक सहायता मिलेगी?
- अगर जांच में लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदार अधिकारी पर कार्रवाई होगी या मामला फाइलों में दब जाएगा?
- क्या विभाग बताएगा कि राधेश्याम की मौ/त सिर्फ हादसा थी या व्यवस्था की लापरवाही का परिणाम?
एक कर्मचारी की मौ/त को सिर्फ आंकड़ा बनाकर छोड़ देना आसान है, लेकिन उसके पीछे उजड़ा परिवार जिंदगी भर इस सवाल का जवाब ढूंढेगा—राधेश्याम की जान आखिर गई क्यों? #bdbiharjharkhand