महापुरुषों की विरासत पर उपेक्षा की धूल, चंपारण आंदोलन के सूत्रधार पंडित राजकुमार शुक्ल का स्मारक बदहाल, क्या सिर्फ जयंतियों तक सीमित रह गया है सम्मान?
बेतिया -नरकटियागंज/मुरली भरहवा। देश की आजादी की लड़ाई में मील का पत्थर साबित हुए 1917 के ऐतिहासिक चंपारण सत्याग्रह की जब भी चर्चा होती है, पंडित राजकुमार शुक्ल का नाम सबसे आगे आता है। यह वही शख्सियत थे जिन्होंने महात्मा गांधी की उंगली पकड़कर उन्हें चंपारण की धरती पर अंग्रेजों के अत्याचार और नीलहों के शोषण के खिलाफ खड़ा किया था। बापू को 'महात्मा' बनाने की शुरुआत करने वाले इस महान स्वतंत्रता सेनानी की विरासत आज अपने ही पैतृक गांव मुरली भरहवा में प्रशासनिक संवेदनहीनता और सरकारी उपेक्षा के आंसू बहा रही है। स्वतंत्रता आंदोलन की दिशा तय करने वाले महापुरुष का स्मारक स्थल आज जिस दयनीय स्थिति में है, वह व्यवस्था और समाज दोनों के लिए एक गहरा तमाचा है।
मुरली भरहवा स्थित पंडित राजकुमार शुक्ल जी की प्रतिमा और स्मारक परिसर की मौजूदा तस्वीरें दिल को झकझोर देने वाली हैं। आदमकद प्रतिमा पर पक्षियों की गंदगी जमी हुई है, जो साफ बयां करती है कि महीनों से यहां सफाई का कोई नामोनिशान नहीं रहा। पूरे परिसर में इंसानों से ज्यादा जंगली झाड़ियों, कांटों और खरपतवार का बसेरा हो चुका है। स्मारक के आसपास खड़े ढांचे रखरखाव के अभाव में जर्जर होकर बिखरने की कगार पर हैं। नदी के किनारे स्थित होने के कारण इस धरोहर पर कटाव और प्राकृतिक मार का खतरा हमेशा बना रहता है, जिसके लिए विशेष सुरक्षात्मक कदम उठाए जाने चाहिए थे, लेकिन हकीकत में यहां बुनियादी संरक्षण तक उपलब्ध नहीं कराया गया है। न तो परिसर में सुरक्षा का कोई पुख्ता इंतजाम है और न ही शाम ढलते अंधेरे को चीरने वाली प्रकाश व्यवस्था।
यह बदहाली इस कटु और कड़वे सवाल को जन्म देती है कि क्या हमारे महापुरुष केवल जयंती और पुण्यतिथि पर ही याद किए जाने के लिए हैं? सत्ता, शासन और संबंधित विभागों के नुमाइंदे केवल खास मौकों पर कैमरों की चकाचौंध के बीच यहां आते हैं, प्रतिमा पर फूल-मालाएं चढ़ाते हैं, लंबे-चौड़े वादों का भाषण देते हैं और फिर पूरे साल के लिए इस ऐतिहासिक धरोहर को लावारिस छोड़ देते हैं। माला सूखकर गिर जाती है, लेकिन नेताओं और अफसरों के खोखले दावों की हकीकत वहीं झाड़ियों के बीच दबी रह जाती है। सवाल उठता है कि क्या संस्कृति और पर्यटन विभाग के पास इस ऐतिहासिक स्थल के संरक्षण की कोई तय जवाबदेही है? क्या नियमित साफ-सफाई और परिसर के सौंदर्यीकरण के लिए सरकारी खजाने में कोई स्थायी व्यवस्था नहीं है? नदी किनारे जर्जर हो रही इन संरचनाओं को बचाने कीt योजना फाइलों में कब तक दबी रहेगी?
स्थानीय ग्रामीणों और बुद्धिजीवियों में इस ऐतिहासिक उपेक्षा को लेकर भारी आक्रोश है। ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि प्रशासन और संबंधित विभाग कागजी औपचारिकताएं छोड़कर तत्काल जमीनी स्तर पर स्थल का निरीक्षण करें। प्रतिमा की नियमित स्वच्छता, परिसर में फैली झाड़ियों की कटाई, प्रकाश व्यवस्था, बाउंड्री वॉल और नदी की ओर से सुरक्षा तटबंध का निर्माण अविलंब कराया जाना चाहिए। इतिहास गवाह है कि जो कौम अपने नायकों की विरासत को सहेजना भूल जाती है, वह अपनी पहचान भी खो बैठती है। ऐसे में वक्त रहते ठोस कदम उठाना जरूरी है, ताकि आने वाली पीढ़ियां देश के इस महान पुरोधा के योगदान और सम्मान को बदहाली के आइने में न देखें।
Bihar, India | Oct 4, 2026