दुमका का राजकीय पुस्तकालय… कभी शहर का गौरव था, आज बदहाली की कहानी कह रहा है।
1956 में स्थापित यह पुस्तकालय कभी ज्ञान और साहित्य का बड़ा केंद्र हुआ करता था। एक दौर में इसका कायाकल्प हुआ, साहित्यिक गतिविधियां बढ़ीं और यहां देश के जाने-माने साहित्यकारों ने हिस्सा लिया।
लेकिन आज तस्वीर बदल गई है।
संताल परगना के गांव-गांव तक किताबें पहुंचाने वाला राजकीय भ्रमणशील पुस्तकालय का यह ऐतिहासिक वाहन देखिए… बीआरएल-1126 अब खुद संरक्षण का इंतजार कर रहा है।
पुराने भवन की दीवारों पर काई, छत और दीवारों पर उग आए पेड़… और नए भवन की हालत भी सवाल खड़े कर रही है।
विडंबना देखिए—जहां बैठकर छात्र जेपीएससी और सिविल सर्विस जैसी परीक्षाओं की तैयारी कर सफलता हासिल कर रहे हैं, वही पुस्तकालय आज उपेक्षा का शिकार है।
सवाल सीधा है—दुमका की इस ऐतिहासिक धरोहर को यूं ही बदहाल छोड़ दिया जाएगा?
और जिस ऐतिहासिक परिसर में आज पलाश भवन का निर्माण हो रहा है, क्या वहां निर्माण होना चाहिए था या इस जगह को पुस्तकालय और साहित्यिक गतिविधियों के लिए संरक्षित किया जाना चाहिए था?
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