बैतूल के विश्वकर्मा मंदिर में अखिल भारतीय साहित्य परिषद के तत्वावधान में "आत्मबोध से विश्वबोध" विषय पर व्याख्यान माला का आयोजन किया गया, जिसमे जिले भर में उत्कृष्ट कार्य करने वाले लोगों को एक जगह एकत्रित कर साहित्य परिषद द्वारा केंद्रीय मंत्री के हाथो उनका सम्मान कराया गया।केन्द्रीय मन्त्री दुर्गादास उइके के साथ सहभागिता कर अपने विचार रखे । इस अवसर पर साहित्य परिषद द्वारा कार्यक्रम में उपस्थित युवाओं, प्रबुद्धजनों से संवाद में भारतीय से भारतीय संस्कृति के सर्व समावेशी चिन्तन पर अपनी बात कही ।आत्मबोध से विश्वबोध' वह चेतना यात्रा है जो मनुष्य को अपने भीतर के अहम से निकालकर संपूर्ण ब्रह्मांड के 'वयं' और चराचर जगत से जोड़ती है । आत्म बोध हमें अपने जीवन के उद्देश्य एवं कर्तव्य का स्पष्ट बोध कराता है । भारत का गौरवशाली इतिहास और संस्कृति के स्मरण से हमारा आत्मगौरव बढ़ता है।
केंद्रीय राज्यमंत्री ने कहा साथियों, मनुष्य के जीवन में परिवर्तन की शुरुआत बाहर से नहीं, अपने भीतर से होती है। इसी भाव के साथ “आत्म संवाद” से “आत्म अनुभूति”, “आत्म समीक्षा” और “आत्म बोध” तक की क्रमिक यात्रा पर अपने विचार साझा किए। आत्म संवाद हमें स्वयं से प्रश्न करना सिखाता है,आत्म अनुभूति हमें उन भावों को अनुभव करना सिखाती है, आत्म समीक्षा हमें अपनी कमियों को पहचानकर सुधारने की प्रेरणा देती है, और आत्म बोध हमें अपने जीवन के उद्देश्य एवं कर्तव्य का स्पष्ट बोध कराता है।
जब व्यक्ति स्वयं को जानता है, तब वह परिवार, समाज, राष्ट्र और संपूर्ण मानवता के प्रति अपने दायित्व को भी बेहतर ढंग से समझ पाता है। आत्मबोध से विश्व बोध की यह यात्रा वास्तव में “मैं” से “हम” और “स्व” से “सर्व” की यात्रा है।
इस अवसर पर मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद के उपाध्यक्ष राज्य मंत्री पद्मश्री मोहन नागर जी, साहित्य परिषद के अखिल भारतीय प्रचार प्रसार प्रमुख श्री डॉ प्रवीण गुगनानी जी, सुनील पांसे जी, दीपक कपूर जी, मालवीय जी के साथ ही वरिष्ठजन उपस्थित रहे।