छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक और स्पष्ट फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि स्वयंभू शरिया कोर्ट या कोई भी निजी धार्मिक निकाय नागरिकों के वैवाहिक अधिकारों और स्टेटस को बदलने का कानूनी अधिकार नहीं रखते हैं। अदालत ने कहा कि धर्म व्यक्तिगत आस्था का विषय हो सकता है, लेकिन किसी भी अनौपचारिक धार्मिक मंच को कानूनी रूप से स्थापित अदालत की शक्तियों का उपयोग करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
यह फैसला उन तमाम मामलों में एक बड़ी कानूनी मिसाल बन गया है जहां अनौपचारिक पंचायतें या धार्मिक निकाय पारिवारिक और दांपत्य मामलों में दखल देते हैं। इस फैसले से उन महिलाओं को बड़ी राहत मिली है जो निजी निकायों के एकतरफा और दबाव वाले फैसलों का शिकार होती हैं, और यह कानूनी रूप से जानना बेहद जरूरी है कि देश का संविधान किसी भी समानांतर न्यायिक व्यवस्था की अनुमति नहीं देता है।
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Korba, Korba | Sep 9, 2026