सिरमौर के राजगढ़ में दुर्गा अष्टमी का पर्व पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। स्थानीय बोली में आठयो कहलाने वाले इस पर्व पर धराड़ा–धराड़ी पूजा के जरिए लोक संस्कृति और सदियों पुरानी परंपराओं की अनूठी झलक देखने को मिली।
राजगढ़ और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में 18 अक्तूबर को आठयो पर्व श्रद्धा और पारंपरिक उत्साह के साथ मनाया गया। इस दौरान ग्रामीणों ने सफेद फूलों से धराड़ा यानी नर और धराड़ी यानी मादा के प्रतीक तैयार कर विधिवत पूजा-अर्चना की।
परंपरा के अनुसार, पूजा में हलवा, गेहूं के मूड़े, अखरोट, गुड़ और देशी घी सहित पारंपरिक सामग्री अर्पित की गई। पूजा के बाद प्रतीकों को जल स्रोत तक ले जाने की रस्म भी निभाई गई। यह पर्व प्रकृति, लोक आस्था और पूर्वजों की विरासत से ग्रामीणों के गहरे जुड़ाव को दर्शाता है।
सिरमौर की लोक संस्कृति के संरक्षण में पद्मश्री विद्यानंद सरैक और साहित्यकार एवं लोक कलाकार डॉ. जौग्रेंद्र हाब्बी जैसे विद्वानों का योगदान भी उल्लेखनीय रहा है।
आधुनिकता के दौर में भी आठयो जैसे पारंपरिक पर्व हिमाचल की समृद्ध लोक संस्कृति को जीवंत बनाए हुए हैं।
न्यूज टुडे हिमाचल के लिए राजगढ़ से रवि दत्त भारद्वाज की रिपोर्ट।