ऑनलाइन दुनिया… और ऑफलाइन रिश्ते
आज सब कुछ आसान हो गया है—
पेमेंट एक क्लिक में, टिकट एक क्लिक में, काम एक क्लिक में…
लेकिन क्या रिश्ते भी अब “एक क्लिक” तक सीमित हो गए हैं?
एक बुज़ुर्ग पिता…
जिसने पूरी ज़िंदगी अपने बच्चों के लिए सपने बुने,
खुद की इच्छाएँ दबाकर उनका भविष्य बनाया…
आख़िर में वो अकेला रह गया—एक वृद्धाश्रम में।
बीमारी में साथ नहीं…
आख़िरी समय में हाथ पकड़ने वाला कोई नहीं…
और जब दुनिया से विदा हुए,
तो विदाई भी “ऑनलाइन” हो गई।
कुछ पैसों का ट्रांसफर…
एक वीडियो कॉल…
और बस, एक ज़िंदगी का अंत।
सोचने वाली बात ये नहीं है कि तकनीक कहाँ पहुँच गई,
बल्कि ये है कि इंसानियत कहाँ पीछे छूट गई।
हम तरक्की कर रहे हैं या सिर्फ सुविधाओं के आदी हो गए हैं?
क्या हम इतना व्यस्त हो गए हैं कि
माँ-बाप के आख़िरी समय में भी उनके पास नहीं पहुँच सकते?
याद रखिए—
स्क्रीन पर दिखने वाले आँसू कभी
हाथ पकड़ने की गर्माहट की जगह नहीं ले सकते।
आज वक्त है रुककर सोचने का…
कहीं हम भी तो अपने रिश्तों को “ऑनलाइन” तो नहीं कर रहे?
Kullu, Kullu | Aug 7, 2026