आज फिर जंगल हार गया,
और सड़क जीत गई।
एक-एक पेड़ गिरता रहा,
धरती चुप रही,
पक्षी उड़ते रहे,
आसमान देखता रहा।
कटे हुए तनों को
जेसीबी अपने साथ ले गई,
जैसे कोई यादें समेटकर
घर छोड़ रहा हो।
जो हाथ दिनभर
जंगल को काटते रहे,
शाम ढलते ही
उन्हीं कटे हुए पेड़ों पर बैठकर
अपनी थकान मिटाने लगे।
कितना अजीब है इंसान...
जिस पेड़ ने जीते-जी छाँव दी,
मरने के बाद भी
उसी ने आराम दिया।
पेड़ कभी शिकायत नहीं करते,
बस एक दिन
चुपचाप ख़त्म हो जाते हैं।
और फिर हम कहते हैं—
"जंगल कहाँ चले गए?"
ऋषिकेश-भानियावाला सड़क चौड़ीकरण प्रोजेक्ट जिसमें 4000 से ज्यादा पेड़ों को काटा जा रहा है।