भिवानी, 12 जुलाई 2026
दिनोद धाम में परमसंत हुज़ूर कँवर साहेब महाराज का विराट सत्संग, कहा— परमात्मा की रज़ा में चलने वाला ही पाता है सच्चा सुख
दिनोद धाम स्थित राधास्वामी आश्रम में रविवार को परमसंत हुज़ूर कँवर साहेब महाराज के पावन सान्निध्य में विशाल सत्संग का आयोजन हुआ। इस अवसर पर हरियाणा सहित देश के विभिन्न राज्यों से पहुँची हजारों की संख्या में श्रद्धालु संगत ने सत्संग में भाग लिया और गुरु वचनों का श्रवण कर आध्यात्मिक लाभ प्राप्त किया। पूरे आश्रम परिसर में श्रद्धा, भक्ति एवं आध्यात्मिक वातावरण का अद्भुत दृश्य देखने को मिला।सत्संग के दौरान परमसंत हुज़ूर कँवर साहेब जी महाराज ने कहा कि “होई सोई जो राम रची राखा, फिर किस बात का तर्क-वितर्क करना। होगा वही जो परमात्मा चाहेगा, मनुष्य के चाहने मात्र से कुछ नहीं होता।” उन्होंने कहा कि परमात्मा ने मनुष्य को सभी जीवों में श्रेष्ठ बनाया है ताकि वह विवेक, धर्म और भक्ति के मार्ग पर चलकर अपने जीवन को सार्थक बना सके, किन्तु काल और माया के प्रभाव में पड़कर मनुष्य अपने वास्तविक उद्देश्य को ही भूल बैठता है।उन्होंने कहा कि जीवन में जब कोई दुःख, संकट या विपत्ति आती है तो मनुष्य भक्ति, सेवा और सात्विक जीवन का संकल्प लेता है, लेकिन समय बीतने के साथ वह पुनः सांसारिक आकर्षणों में उलझ जाता है। मनुष्य को यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि उसके प्रत्येक कर्म का फल उसे अवश्य भोगना पड़ता है। इसलिए प्रत्येक कार्य धर्म, सत्य और सदाचार के अनुरूप होना चाहिए।
परमसंत ने कहा कि संत-सतगुरु की कृपा अत्यंत दुर्लभ होती है और उसका सम्मान वही कर पाता है, जिसके भीतर सच्ची श्रद्धा और समर्पण होता है। संसार की भौतिक वस्तुएँ मनुष्य को अहंकार की ओर ले जाती हैं, जबकि संतों का मार्ग विनम्रता, सेवा, प्रेम और आत्मकल्याण का मार्ग है। उन्होंने कहा कि मनुष्य को केवल जगत की नहीं, बल्कि अपनी आत्मा की गति और परमात्मा से मिलन की चिंता करनी चाहिए।उन्होंने कहा कि मन की इच्छाएँ और तृष्णाएँ कभी समाप्त नहीं होतीं। यदि मनुष्य इनके पीछे ही भागता रहेगा तो उसे कभी शांति प्राप्त नहीं होगी। दृढ़ विश्वास के बिना प्रेम नहीं होता और प्रेम के बिना भक्ति संभव नहीं है। मनुष्य अपने पूर्व जन्मों के कर्मों का बोझ लेकर आता है, लेकिन वर्तमान जीवन में भी ऐसे कर्म करता है जिससे वह बोझ और बढ़ जाता है।
हुज़ूर कँवर साहेब जी महाराज ने कहा कि संत-सतगुरु का दर्शन और नामदान मिलना अत्यंत दुर्लभ सौभाग्य है। गुरु की कृपा से ही नाम मिलता है और नाम के माध्यम से ही परमात्मा तक पहुँचने का मार्ग प्रशस्त होता है। नाम-भक्ति के बिना आत्मकल्याण संभव नहीं है, फिर भी अधिकांश लोग परमात्मा के नाम के स्थान पर सांसारिक सुख-सुविधाओं की ही कामना करते रहते हैं।उन्होंने संगति के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जैसी संगति होती है, वैसी ही मन की गति बनती है। इसलिए सदैव गुरुमुखों और सज्जनों की संगति करनी चाहिए। जो लोग गुरु, सत्संग और भक्ति की निंदा करते हैं तथा दूसरों को भी सत्संग से दूर करते हैं, वे स्वयं भी पतन की ओर जाते हैं और दूसरों के आध्यात्मिक मार्ग में भी बाधा उत्पन्न करते हैं। ऐसे लोगों से दूरी बनाए रखना ही हितकर है।परमसंत ने कहा कि सत्संग मनुष्य के भीतर की बुराइयों को दूर करता है और उसे सच्चे जीवन का मार्ग दिखाता है। जो व्यक्ति स्वयं बुराइयों में डूबा रहता है, उसे सत्संग अच्छा नहीं लगता। वह न केवल स्वयं दूर रहता है, बल्कि दूसरों को भी भक्ति मार्ग से भटकाने का प्रयास करता है। ऐसे लोग दोहरे पाप के भागीदार बनते हैं।उन्होंने कहा कि मन की शांति, विचारों की शुद्धता और वातावरण की पवित्रता के बिना न तो नाम-सुमिरन सफल हो सकता है और न ही भक्ति का वास्तविक आनंद प्राप्त हो सकता है। इसलिए जीवन में सदैव संयम, शुद्ध आचरण और सकारात्मक विचारों को अपनाना आवश्यक है।अपने प्रेरक संदेश में उन्होंने कहा कि यदि मनुष्य उच्च चरित्र, परिवार में प्रेम और शांति, माता-पिता एवं बड़े-बुजुर्गों की सेवा, बच्चों को उत्तम संस्कार, प्रकृति के प्रति प्रेम तथा सदाचारपूर्ण जीवन को अपनाता है तो वह गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी आध्यात्मिक उन्नति और फकीरी का आनंद प्राप्त कर सकता है। जिस प्रकार की संगति मनुष्य करता है, उसी प्रकार के संस्कार और गुण उसके भीतर विकसित होते हैं। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में महापुरुषों के चित्र घरों में सम्मानपूर्वक स्थापित किए जाते हैं, ताकि उनके आदर्श जीवन को प्रेरणा मिलती रहे।सत्संग के समापन पर परमसंत हुज़ूर कँवर साहेब जी महाराज ने कहा कि प्रत्येक कर्म धर्मसम्मत होना चाहिए, क्योंकि जैसा बीज बोया जाता है, वैसा ही फल प्राप्त होता है। उन्होंने सात्विक एवं शुद्ध आहार को भी आध्यात्मिक जीवन का आधार बताते हुए कहा कि मनुष्य का अन्न ही उसके मन और विचारों की दिशा निर्धारित करता है। उन्होंने संगत को संदेश दिया कि गृहस्थ जीवन में रहकर परिश्रमपूर्वक आजीविका अर्जित करें, किन्तु धन और सांसारिक मोह को अपने हृदय पर शासन न करने दें। जब तक मनुष्य संसार के क्षणभंगुर सुखों का मोह नहीं छोड़ता, तब तक वह परमात्मा के दिव्य आनंद का अनुभव नहीं कर सकता।सत्संग के उपरांत संगत ने मानवता के कल्याण, विश्व शांति तथा समस्त प्राणियों के मंगल की कामना करते हुए गुरुचरणों में श्रद्धा अर्पित की।