कोई माने या न माने... सच्चाई यही है।
जिन अधिकारियों के कंधों पर जनता की समस्याओं का समाधान करने, जनकल्याणकारी योजनाओं को धरातल पर उतारने और विकास कार्यों को ईमानदारी से लागू करने की जिम्मेदारी होती है, उनका पूरा ध्यान अक्सर जनहित पर नहीं, बल्कि अपनी कुर्सी, दिखावे, आंकड़ों और चापलूसी की राजनीति पर केंद्रित दिखाई देता है।
फाइलों में विकास दौड़ता है, प्रेस विज्ञप्तियों में उपलब्धियाँ बरसती हैं, बैठकों में दावे गूंजते हैं... लेकिन ज़मीन पर जनता टूटी सड़कों, जलभराव, गंदगी और बदहाल व्यवस्थाओं से रोज़ जूझती रहती है।
अगर नीयत सचमुच जनसेवा की होती, तो जनता को अपनी समस्याओं के लिए बार-बार आवाज़ उठानी ही नहीं पड़ती। हकीकत यह है कि कई जगह व्यवस्था का आईना चमकाया जाता है, जबकि चेहरा धूल और कीचड़ से ढका रहता है।
Palwal, Palwal | Jul 10, 2026